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Monday, August 7, 2017

रक्षासूत्र का मंत्र


रक्षासूत्र का मंत्र है

येन बद्धो बलिराजा 
दानवेन्द्रो महाबल:।
तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि
रक्षे माचल माचल: ।।
इसका अर्थ है

जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी रक्षाबंधन से मैं तुम्हें बांधता हूं, जो तुम्हारी रक्षा करेगा| हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। 

स्कन्ध पुराण में रक्षाबन्धन का प्रसंग मिलता है।

कथा कुछ इस प्रकार है- दानवेन्द्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राम्हण का वेष धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। गुरु के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। भगवान ने तीन पग में सारा आकाश,पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु द्वारा बलि राजा के अभिमान को चकानाचूर कर देने के कारण यह त्योहार 'बलेव' नाम से भी प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि जब बलि रसातल चला गया तो उसने अपने तप से भगवान को रात- दिन अपने पास रहने का वचन ले लिया| भगवान विष्णु के घर न लौटने से परेशान लक्ष्मी जी को देवर्षि नारद ने एक उपाय सुझाया| नारद के उस उपाय का पालन करते हुए लक्ष्मी जी राजा बलि के पास गई और उन्हें राखी बांधकर अपना भाई बना लिया| उसके बाद अपने पति भगवान विष्णु और बलि को अपने साथ लेकर वापस स्वर्ग लोक चली गईं| उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी।


Sunday, August 6, 2017

श्री शिव चालीसा (Shri Shiv Chalisa)

हिन्दू धर्म में त्रिदेवों की कल्पना की गई है। मान्यता है कि यही त्रिदेव विश्व के रचयिता, संचालक और पालक हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव को संहारक माना गया है। शिवजी को उनके भोले स्वभाव के कारण भोलेनाथ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि शिवजी की आराधना करने वाले जातक मृत्यु का भय भी नहीं सताता।

शिवजी की आराधना के लिए सबसे आसान मंत्र है "ऊं नम: शिवाय"। इस मंत्र के साथ शिवजी की पूजा में शिव चालीसा का भी उपयोग किया जाता है। शिव चालीसा हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में भी वर्णित है।


।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥1॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥2॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥3॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥4॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥5॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥6॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥7॥

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥8॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥9॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥10॥

कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥


Thursday, August 3, 2017

श्री त्रिपुरसुन्दरी

श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम् स्तोत्रं


श्रीसेव्य-पादकमले श्रित-चन्द्र-मौले
श्रीचन्द्रशेखर-यतीश्वर-पूज्यमाने
श्रीखण्ड-कन्दुककृत-स्व-शिरोवतंसे
श्रीमन्महात्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥१॥

उत्तिष्ठ तुङ्ग-कुलपर्वत-राज-कन्ये 
उत्तिष्ठ भक्त-जन-दुःख-विनाश-दक्षे
उत्तिष्ठ सर्व-जगती-जननि प्रसन्ने 
उत्तिष्ठ हे त्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥२॥

उत्तिष्ठ राजत-गिरि-द्विषतो रथात् त्वं 
उत्तिष्ठ रत्न-खचितत् ज्वलिताच्च पीठात्
उत्तिष्ठ बन्धन-सुखं परिधूय शंभोः 
उत्तिष्ठ विघ्नित-तिरस्करिणीं विपाट्य ॥३॥

यत्पृष्ठभागमवलम्ब्य विभाति लक्ष्मीः
यस्या वसन्ति निखिला अमराश्च देहे
स्नात्वा विशुद्धहृदया कपिला सवत्सा
सिद्धा प्रदर्शयितुमिह नस्तव विश्वरूपम् ॥४॥

आकर्ण्यतेऽद्य मदमत्त-गजेन्द्रनादः
त्वं बोध्यसे प्रतिदिनं मधुरेण येन
भूपालरागमुखरा मुखवाद्यवीणा
भेरीध्वनिश्च कुरुते भवतीं प्रबुद्धाम् ॥५॥

त्वां सेवितुं विविध-रत्न-सुवर्ण-रूप्य-
खाद्यम्बरैः कुसुम-पत्र-फलैश्च भक्ताः
श्रद्धान्विताः जननि विस्मृत-गृह्य-बन्धाः
आयान्ति भारत-निवासि-जनाः सवेगम् ॥६॥

जीवातवः सुकृतिनः श्रुतिरूपमातुः
विप्राः प्रसन्न-मनसो जपितार्क-मन्त्राः
श्रीसूक्त-रुद्र-चमकाद्यवधारणाय
सिद्धाः महेश-दयिते तव सुप्रभातम् ॥७॥

फालप्रकासि-तिलकाङ्क-सुवासिनीनां
कर्पूर-भद्र-शिखया तव दृष्टि-दोषम्
गोष्ठी विभाति परिहर्तुमनन्यभावा
हे देवि पङ्क्तिश इयं तव सुप्रभातम् ॥८॥

उग्रः सहस्र-किरणोऽपि करं समर्प्य 
त्वत्तेजसः पुरत एष विलज्जितः सन्
रक्तस्तनावुदयमेत्यगपृष्ठलीनः पद्मं 
त्वदास्यसहजं कुरुते प्रसन्नम् ॥९॥

नृत्यन्ति बर्हनिवहं शिखिनः प्रसार्य
गायन्ति पञ्चमगतेन पिकाः स्वरेण
आस्ते तरङ्गतति-वाद्य-मृदङ्ग-नादः
तौर्यत्रिकं शुभमकृत्रिममस्तु तुभ्यम् ॥१०॥

संताप-पाप-हरणे त्वयि दीक्षितायां
संताप-हारि-शशि-पापहरापगाभ्याम्
कुत्रापि धूर्जटि-जटा-विपिने निलीनं
छिन्ना सरित् क्षयमुपैति विधुश्च वक्रः ॥११॥

भुक्त्वा कुचेल-पृतुकं ननु गोपबालः
आकर्ण्य ते व्यरचयत् सुहृदं कुबेरम्
व्याजस्य नास्ति तव रिक्त-जनादपेक्षा
निर्व्याजमेव करुणां नमते तनोषि ॥१२॥

प्राप्नोति वृद्धिमतुलां पुरुषः कटाक्षैः 
द्वन्द्वी ध्रुवं क्षयमुपैति न चात्र शङ्का
मित्रस्तवोषसि पदं परिसेव्य वृद्धः
चन्द्रस्त्वदीय-मुखशत्रुतया विनष्टः ॥१३॥

सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साक्षिणि विश्व-मातः
स्वर्गापवर्ग-फल-दायनि शंभु-कान्ते
श्रुत्यन्तखेलिनि विपक्ष-कठोर-वज्रे 
भद्रे प्रसन्न-हृदये तव सुप्रभातम् ॥१४॥

मातः स्वरूपमनिशं हृदि पश्यतां ते
को वा न सिद्ध्यति मनश्चिर-कांक्षितार्थः
सिद्ध्यन्ति हन्त धरणी-धन-धान्य-धाम-
धी-धेनु-धैर्य-धृतयः सकलाः पुमार्थाः ॥१५॥

इति श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम्


अष्ट सिद्धियाँ


सिद्धियाँ 8 प्रकार की होती हैं 

1. अणिमा - जिसके पास ये सिद्धि होती है वो व्यक्ति अपने शरीर को अनु या एटम जितना छोटा बना सकता      है।
2. महिमा - इस सिद्धि से व्यक्ति अपने शरीर को जितना चाहे बड़ा बना सकता है।
3. गरिमा - इस सिद्धि से व्यक्ति अपने शरीर को जितना चाहे उतना भारी कर सकता है।
4. लघिमा - इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को बिलकुल हल्का बना सकता है ।
5. प्राप्ति - इस सिद्धि से व्यक्ति किसी भी स्थान में बिना रोक टोक जा सकता हैं।
6. प्राकाम्य - इस सिद्धि को प्राप्त करने से मनुष्य जिस भी चीज की इच्छा करता है वो उसे प्राप्त कर लेता है  ।7. इशित्वा - इस सिद्धि की प्राप्ति से मनुष्य किसी भी व्यक्ति पर स्वामित्व प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।
8. वशित्वा - इस सिद्धि को प्राप्त करने से मनुष्य हर प्रकार के युद्ध में विजय प्राप्त करता है ।

देवी माँ सिद्धिदात्री की कृपा से इन 8 सिद्धियों को प्राप्त किया जा सकता है

देवी दुर्गा जी के नौवें रूप का नाम देवी सिद्धिधात्री है , वे सभी प्रकार की सिद्धियों को देने में समर्थ हैं।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार आठ प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्वा, वाशित्वा।

इनकी पूजा करने से साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है साधक का संपूर्ण जगत पर अधिकार हो जाता है उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।




Tuesday, August 1, 2017

Achaleshwar Mahadev Temple

Achaleshwar Mahadev Temple - Toe Print of Lord Shiva


The Achaleshwar Mahadev Temple (Devanagari: अचलेश्वर महादेव मन्दिर, Acaleśavara Mahādeva Mandir) is a Shiva temple situated just outside the Achalgarh Fort, located in the Abu Road tehsil of Sirohi district, in the western Indian state of Rajasthan. The temple is believed to have been constructed sometime in the 9th century AD, and by the Paramara dynasty, which is also credited with having constructed the original structure of the Achalgarh Fort, later reconstructed, renovated and named as Achalgarh by Maharana Kumbha in 1452 CE.

The word 'Achaleshwar' is a word displaying Sanskritic sandhi and is derived from the Sanskrit words 'Achal' meaning immovable, and 'Ishwar' meaning 'God', while the word 'Mahadeva', again formed by the rules of sandhi, means the great (maha) god (deva), and is an epithet of Shiva, the deity to whom the temple is dedicated.

According to local legend, the temple is built around a toe print of Shiva. Shiva is worshipped, like at most Shiva temples, in the form of a Shiva linga, a phallus shaped structure representing Shiva and the power of creation, seated on top of a yoni, an abstract representation of Shakti. The shiva linga at this temple is a naturally occurring stone structure.

The temple stands in the centre of an enclosure on the southern side of the Agnikund, wherein there are several small shrines dedicated to Shiva's mount, Nandi.[1] Of particular interest and importance is a four tonne statue of Nandi made of panchadhatu, the alloy used for making idols, which is composed of five metals – gold, silver, copper, brass and zinc. According to a popular local legend, the statue of Nandi is credited with protecting the temple from an attack of Muslim invaders by releasing innumerable bumble bees onto the attackers thereby saving the temple from destruction. The temple also has several other idols, sculpted from sphatik, a quartz stone, which appears opaque in natural light but becomes crystal-like translucent when a light is held against it.

Within the temple is a pit which is believed by the locals to be a doorway to Naraka, the netherworld. Close to the temple is a pond with three large stone buffalo statues. These buffaloes are believed to be representative of demons who, according to legend, flocked to the watering hole, which was said to be filled with ghee, until they were shot dead by the king, Raja Adi Pal.

ॐ नमः शिवाय


महाकाली महाविजय यन्त्र / कवच धारण से लाभ

१.  महाकाली की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है | स्थायी सम्पत्ति में विशेष वृद्धि होती है और     स्थावर सम्पत्ति विषयक...