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Thursday, August 31, 2017

दुर्गा सप्तशति - Durga Saptashati


Durga Saptashati is a Hindu religious text describing the victory of the goddess Durga over the demon Mahishasura. Durga Saptashati is also known as the Devi Mahatmyam, Chandi Patha (चण्डीपाठः) and contains 700 verses, arranged into 13 chapters.

दुर्गा सप्तशति का कौन सा अध्याय करता है हमारी मनोकामना पूरी और क्या फल है इसके
दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति-


1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
"The first chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Madhu and Kaitabha' ".

2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।
"The second chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaughter of the armies of Mahishasura' ".

3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।
"The third chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Mahishasura' ".

4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।
"The fourth chapter of Durga Saptashati is based on 'Devi Stuti' ".

5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
"The fifth chapter of Durga Saptashati is based on 'Devi's conversation with the messenger' ".

6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।
"The sixth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Dhumralochana' ".

7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।
"The seventh chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Chanda and Munda' ".

8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।
"The eighth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Raktabija' ".

9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
"The ninth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Nishumbha' ".

10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामनाएवं पुत्र आदि के लिये।
"The tenth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Shumbha' ".

11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।
"The eleventh chapter of Durga Saptashati is based on 'Hymn to Narayani' ".

12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।
"The twelfth chapter of Durga Saptashati is based on 'Eulogy of the Merits' ".

13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।
"The thirteenth chapter of Durga Saptashati is based on 'the bestowing of boons to Suratha and Vaisya' ".


Thursday, August 24, 2017

गणेश जी के 108 नाम

The Shree Siddhivinayak Ganapati Mandir is a Hindu temple dedicated to Lord Shri Ganesh. It is located in Prabhadevi, Mumbai, Maharashtra.

आधुनिक समय में अधिकतर सभी व्यक्ति किसी ना किसी परेशानी से त्रस्त रह रहे हैं. इस परेशानी को बहुत हद तक कम किया जा सकता है यदि सुबह के समय गणेश जी के 108 नाम लिए जाएँ. गणेश जी को वैसे भी विघ्नहर्त्ता कहा गया है. गणेश जी के 108 नाम और उनके अर्थ निम्नलिखित हैं :-

1)  बालगणपति (Baalganapati) -  सबसे प्रिय बालक
2)  भालचन्द्र (Bhalchandra) -  मस्तक पर चंद्रमा
3)  बुद्धिनाथ (Buddhinath) - बुद्धि के भगवान
4)  धूम्रवर्ण (Dhumravarna) - धुंए को उड़ाने वाला
5)  एकाक्षर (Ekakshar) - एकल अक्षर
6)  एकदन्त (Ekdant) -  एक दांत वाले
7)  गजकर्ण (Gajkarn) - हाथी की आंखें
8)  गजानन (Gajaanan) - हाथी मुँख वाले
9)  गजनान (Gajnaan) -  हाथी के मुख वाले
10)  गजवक्र (Gajvakra) - हाथी जैसा मुंह
11)  गजवक्त्र (Gajvaktra) -
12)  गणाध्यक्ष (Ganaadhyaksha) - गणों का मालिक
13)  गणपति (Ganapati) -  गणों का मालिक
14)  गौरीसुत (Gaurisut) - माता गौरी का बेटा
15)  लम्बकर्ण (Lambakarn) - बड़े कान वाले देव
16)  लम्बोदर (Lambodar) - बड़े पेट वाले
17)  महाबल ( Mahaabal) - अत्यधिक बलशाली
18)  महागणपति (Mahaaganapati) - देवातिदेव
19)  महेश्वर (Maheshwar)  - ब्रह्मांड के भगवान
20)  मंगलमूर्त्ति  (Mangalmurti) -  शुभ कार्य के देव
21)  मूषकवाहन (Mushakvaahan -  जिसका सारथी मूषक
22)  निधिश्वरम (Nidishwaram) -  धन और निधि के दाता
23)  प्रथमेश्वर  (Prathameshwar) -  सब के बीच प्रथम
24)  शूपकर्ण (Shoopkarna) -  बड़े कान वाले देव
25)  शुभम (Shubham) -  शुभ कार्यों के प्रभु
26)  सिद्धिदाता (Siddhidata) -  इच्छाओं के स्वामी
27)  सिद्दिविनायक (Siddhivinaayak) -  सफलता के स्वामी
28)  सुरेश्वरम (Sureshvaram) -  देवों के देव
29)  वक्रतुण्ड (Vakratund) -  घुमावदार सूंड
30)  अखूरथ (Akhurath) -  जिसका सारथी मूषक है
31)  अलम्पत (Alampat) -  अनन्त देव
32)   अमित ( Amit) - अतुलनीय प्रभु
33)  अनन्तचिदरुपम ( Anantchidrupam) -  अनंत चेतना
34)  अवनीश  (Avanish) -  पूरे विश्व के प्रभु
35)  अविघ्न (Avighn) - बाधाओं को हरने वाले
36)  भीम (Bheem) -  विशाल
37)  भूपति ( Bhupati) -  धरती के मालिक
38)  भुवनपति (Bhuvanpati) -  देवों के देव
39)  बुद्धिप्रिय ( Buddhipriya) - ज्ञान के दाता
40)  बुद्धिविधाता (Buddhividhata) -  बुद्धि के मालिक
41)  चतुर्भुज (Chaturbhuj) -  चार भुजाओं वाले
42)  देवदेव (Devdev) -  सभी भगवान में सर्वोपरी
43)  देवांतकनाशकारी (Devantaknaashkari) -  बुराइयों और असुरों के विनाशक
44)  देवव्रत (Devavrat) -  तपस्या स्वीकार करने वाले
45)  देवेन्द्राशिक (Devendrashik) -  सभी देवताओं के रक्षक
46)  धार्मिक (Dharmik) -  दान देने वाला
47)  दूर्जा (Doorja) -  अपराजित देव
48)  द्वैमातुर (Dwemaatur) -  दो माताओं वाले
49)  एकदंष्ट्र  (Ekdanshtra) -  एक दांत वाले
50)  ईशानपुत्र (Ishaanputra) - शिव के बेटे
51)  गदाधर (Gadaadhar) -  जिसका हथियार गदा
52)  गणाध्यक्षिण  (Ganaadhyakshina) - पिंडों के नेता
53)  गुणिन  (Gunin) -  सभी गुणों क ज्ञानी
54)  हरिद्र ( Haridra) -  स्वर्ण के रंग वाला
55)  हेरम्ब (Heramb) -  मां का प्रिय पुत्र
56)  कपिल (Kapil) -  पीले भूरे रंग वाला
57)  कवीश (Kaveesh ) -  कवियों के स्वामी
58)  कीर्त्ति (Kirti) -  यश के स्वामी
59)  कृपाकर ( Kripakar) - कृपा करने वाले
60)  कृष्णपिंगाश (Krishnapingash) -  पीली भूरी आंखवाले
61)  क्षेमंकरी (Kshemankari) -  माफी प्रदान करने वाला
62)  क्षिप्रा (Kshipra) -  आराधना के योग्य
63)  मनोमय  (Manomaya) - दिल जीतने वाले
64)  मृत्युंजय (Mrityunjay) - मौत को हरने वाले
65)  मूढ़ाकरम (Mudhakaram) -  जिन्में खुशी का वास
66)  मुक्तिदायी ( Muktidaayi ) - शाश्वत आनंद के दाता
67)  नादप्रतिष्ठित  (Naadpratishthit) -  जिसे संगीत से प्यार हो
68)  नमस्तेSत  (Namastetu) -  सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69)  नन्दन (Nandan) -  भगवान शिव का बेटा
70)  पाषिण  (Pashin) -
71)  पीताम्बर (Pitaamber) -  पीले वस्त्र धारक
72)  प्रमोद  (Pramod) - आनंद
73)  पुरुष  (Purush) - अद्भुत व्यक्तित्व
74)  रक्त  (Rakta) -  लाल रंग के शरीर वाला
75)  रुद्रप्रिय  (Rudrapriya) -  शिव के चहेते
76)  सर्वदेवात्मन (Sarvadevatmana) -  सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
77)  सर्वसिद्धांत (Sarvasiddhanta) -  कौशल और बुद्धि के दाता
78)  सर्वात्मन (Sarvaatmana) - ब्रह्मांड के रक्षक
79)  शांभवि (Shambhavi) -
80)  शशिवर्णम (Shashivarnam) -  रंग चंद्रमा को भाता हो
81)  शुभगुणकानन (Shubhagunakaanan) -  सभी गुण के गुरु
82)  श्वेता (Shweta ) -  जो सफेद रंग में शुद्ध है
83)  सिद्धिप्रिय (Siddhipriya ) -  इच्छापूर्ति वाले
84)  स्कन्दपूर्वज  (Skandapurvaj) - कार्तिकेय के भाई
85)  सुमुख  (Sumukha)-  शुभ मुख वाले
86)  स्वरुप  (Swarup) - सौंदर्य के प्रेमी
87)  तरुण  (Tarun ) - जिसकी कोई आयु न हो
88)  उद्दण्ड  (Uddanda) -  शरारती
89)  उमापुत्र  (Umaputra) - पार्वत के बेटे
90)  वरगणपति  (Varganapati) - अवसरों के स्वामी
91)  वरप्रद  (Varprada) - इच्छाओं के अनुदाता
92)  वरदविनायक  (Varadvinaayak) -  सफलता के स्वामी
93)  वीरगणपति  (Veerganapati) - वीर प्रभु
94)  विद्यावारिधि  (Vidyavaaridhi) - बुद्धि की देव
95)  विघ्नहर  (Vighnahar) - बाधाओं को दूर करने वाले
96)  विघ्नहर्त्ता  (Vighnahartta) - बुद्धि की देव
97)  विघ्नविनाशन  (Vighnavinashan) - बाधाओं के नाशक
98)  विघ्नराज  (Vighnaraaj) - सभी बाधाओं के मालिक
99)  विघ्नराजेन्द्र  (Vighnaraajendra) - बाधाओं के भगवान
100)  विघ्नविनाशाय  (Vighnavinashay) - बाधाओं के नाशक
101)  विघ्नेश्वर (Vighneshwar) - बाधाओं के हरने वाले
102)  विकट  (Vikat) - अत्यंत विशाल
103)  विनायक  (Vinayak) - सब का भगवान
104)  विश्वमुख  (Vshvamukh) - ब्रह्मांड के गुरु
105)  यज्ञकाय  (Yagyakaay) - सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
106)  यशस्कर  (Yashaskar) - प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107)  यशस्विन  (Yashaswin) - सबसे लोकप्रिय देव
108)  योगाधिप (Yogadhip) - ध्यान के प्रभु

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।

Wednesday, August 23, 2017

ॐ गं गणपतये नमः


"वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटी समप्रभ। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।”

अर्थात हे भव्य शरीर, वक्र सूंड, दश लक्ष सूर्यों की चमक वाले गणेशजी, मेरे सारे कर्मों को विघ्नों से हमेशा मुक्त करते रहना।


गणेश जी विघ्नहर्ता हैं। कहा जाता है कि जिस पर गणेश जी की कृपा हो जाए उसके जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। गणेश जी अपने भक्तों की श्रद्धा और भक्ति देखते हैं। जो भक्त इनके प्रति जितनी श्रद्धा रखता है गणेश जी उस पर उतने ही कृपालु बने रहते हैं। गणेशजी की साधना शीघ्र फलदायी है। गणेश जी जितनी जल्दी अपने भक्तों से गुस्सा होते हैं उतनी ही जल्दी मान भी जाते हैं। शास्त्रों में कुछ आसान उपाय बताए गए हैं जिनसे आप गणेश जी को जल्दी खुश कर सकते हैं।

गणेश जी को खुश करने का सबसे सस्ता और आसान उपाय है दूर्वा से गणेश जी की पूजा करना। उनको प्रिय दूर्वा के चढ़ाने की पूजा शीघ्र फलदायी और सरलतम है। हर दिन सुबह स्नान पूजा करके गणेश जी को पांच दूर्वा यानी हरी घास अर्पित करें। दुर्वा गणेश जी के मस्तक पर रखना चाहिए। चरणों में दुर्वा नहीं रखें।दुर्वा अर्पित करते हुए मंत्र बोलें 'इदं दुर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः'। दूर्वा गणेश जी को इसलिए प्रिय है क्योंकि दूर्वा में अमृत मौजूद होता है। गणपति अथर्वशीर्ष में कहा गया गया है कि जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा दुर्वांकुर से करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। दुर्वा अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, आर्थिक उन्नति होती है और संतान का सुख मिलता है।

भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए दूसरा सबसे आसान तरीका है मोदक का भोग। पद्म पुराण में गणेश जी को मोदक प्रिय होने की जो कथा मिलती है उसके अनुसार देवताओं ने एक दिव्य मोदक माता पार्वती को दिया। गणेश जी ने मोदक के गुणों का वर्णन माता पार्वती से सुना तो मोदक खाने की इच्छा बढ़ गयी। अपनी चतुराई से गणेश जी ने माता से मोदक प्राप्त कर लिया। गणेश जी को मोदक इतना पसंद आया कि उस दिन से गणेश मोदक प्रिय बन गये। गणपत्यथर्वशीर्ष में लिखा है, "यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वांछितफलमवाप्नोति।" इसका अर्थ है जो व्यक्ति गणेश जी को मोदक अर्पित करके प्रसन्न करता है उसे गणपति मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

सिंदूर की लाली गणेश जी को बहुत पसंद है। गणेश जी की प्रसन्नता के लिए लाल सिंदूर का तिलक लगाएं। गणेश जी को तिलक लगाने के बाद अपने माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं। इससे गणेश जी की कृपा प्राप्त होती है। सिंदूर अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

पंचामृत में एक अमृत घी होता है। घी को पुष्टिवर्धक और रोगनाशक कहा जाता है। भगवान गणेश को घी काफी पसंद है। गणपति अथर्वशीर्ष में घी से गणेश की पूजा का बड़ा महात्म्य बताया गया है। जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा घी से करता है उसकी बुद्धि प्रखर होती है।

शमी का पौधा गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। शमी के कुछ पत्ते नियमित गणेश जी को अर्पित करें तो घर में धन एवं सुख की वृद्घि होती है। माना जाता है कि भगवान श्री राम ने भी रावण पर विजय पाने के लिए शमी की पूजा की थी।

भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए पवित्र चावल अर्पित करें। पवित्र चावल उसे कहा जाता है जो टूटा हुआ नहीं हो। पूजा में उबले हुए धान से तैयार चावल का प्रयोग नहीं करें। सूखा चावल गणेश जी को नहीं चढ़ाएं। चावल को गीला करें फिर, 'इदं अक्षतम् ऊं गं गणपतये नमः' मंत्र बोलते हुए तीन बार गणेश जी को चावल चढ़ाएं।

गणेश चतुर्थी 2017: पूजा शुभ मुहूर्त और समय

भगवान गणेश को घर लाने का समय:
मध्याह्न के समय को गणेश पूजा: सुबह 11:25 से 1 बजकर 57 मिनट
24 अगस्त को, चंद्रमा को नहीं देखने  का समय- 20: 27 बजे से शाम 21:02 बजे तक
25 अगस्त को, चंद्रमा को नहीं देखने का समय- 09: 00 बजे से 21: 41 बजे तक
अनंत चतुर्दशी दिवस पर गणेश विसर्जन
गणेश विसर्जन के लिए शुभ चोघडिया मुहूर्त
सुबह का मुहूर्त (चार, लाभ, अमृत) - 09:32 बजे- 14:11 अपराह्न
दोपहर का मुहूर्त (शुभ) = 15: 44 बजे- 17:17 बजे
शाम का मुहूर्त(प्रयोग) = 20:17 अपराह्न - 21: 44 बजे
रात का मुहूर्त (शुभ, अमृत, चार) = 23:11 बजे

जय श्री गणेशाय नमः 

Sunday, August 20, 2017

Somvati Amavasya


Somvati  Amavasya in 2017 is on 21st August  and 18th of December . This Amavasya falls only on the day of Monday. It is observed to be auspicious for all the married women. Performing Pitru Puja is considered to be auspicious as it soothes the souls of our ancestors. 

What to do on Somvati Amavasya

On this day i.e. Somvati Amavsaya, you must donate and do Annadann to poor kids. Doing Maun(remaining silent) is considered to be very fruitful on this day.

2. Devotees observing Somvati Vrat must revolves around 108 times around Peepal tree in the morning.

3. They must chant Shani Mantra and worship Lord Vishnu on this day.

3. Taking bath in the holy rivers (Like Ganga and Triveni) on this amavasya is considered to bring prosperity, make them free from diseases, grief and sorrow and help their ancestors to attain salvation.

Somvati Amavasya : Mythology 

once upon a time there lived a money lender who had seven sons and one daughter. He married all his sons but could not find a suitable match for his daughter.

A monk visited their house regularly and blessed the money lender's daughters-in-law but never blessed the daughter. The daughter told her mother about this and she confronted the monk with this question. The monk did reply and left quietly. This really worried the mother and she called a Pandit.

The Pandit told her that her daughter was destined to become a widow. The girl's mother asked the Pandit for a solution to the problem. He told them that there was a washerwoman who lived on the island of Singhal. If that woman agrees to apply vermilion (Sindoor) on the forehead of the girl, her fate will change. The Pandit also told them that observing fast of Somvati Amavasya will also be instrumental in reversing her fate.

The mother sent her daughter and her youngest son to that island. On their way to the island they came across sea shore and wondered how to cross it. Sitting under a tree they saw a vulture's nest. A male and female vulture lived there with their babies. One day when both vultures had gone out of their nest to fetch some food, a snake entered their nest and attacked the babies. All this was being witnessed by the girl who was sitting there. She immediately jumped to help the vulture babies and saved them from the attack.

When the vultures returned they were really pleased to know what had just happened. As a token of their gratitude they helped the girl to reach the washer woman's house. After reaching her destination she started living with the washer woman.

After a few months the woman was really pleased with the girl and applied vermilion (Sindoor) on her forehead. While returning back to her house she also observed Somvati Amavasya. This reversed her fate and then she lived a happy married life with her husband.

Somvati Amavasya : Spiritual Importance 

The darkness of Somvati Amavasya transcends into a beautiful morning which gives us hope that all our sorrows will go away. It also signifies that only after absolute darkness comes a light, which means that absolute despair gives birth to extreme happiness and bliss. Therefore, we should not be afraid of the dark and be ready to face all the troubles that come our way.

Somvati Amavasya : Pitra Dosha

This day is also very auspicious for performing Pitra Tarpan (offering to the ancestors) as it provides peace to their souls. People suffering from Pitra Dosh should also observe this fast as it frees them from it.  You can also offer milk rice ( Kheer ) facing South to fire  It is believed that we can bring peace to our ancestors’ souls by taking a holy dip in the sacred river Ganga on this day. The holy dip washes away all our sorrows and helps us progress and prosper.


Friday, August 18, 2017

॥ एकाक्षरगणपतिकवचम् ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

  
नमस्तस्मै गणेशाय सर्वविघ्नविनाशिने । 
कार्यारम्भेषु सर्वेषु पूजितो यः सुरैरपि ॥ १॥ 

पार्वत्युवाच । 
भगवन् देवदेवेश लोकानुग्रहकारकः ।
 इदानी श्रोतृमिच्छामि कवचं यत्प्रकाशितम् ॥ २॥ 

एकाक्षरस्य मन्त्रस्य त्वया प्रीतेन चेतसा ।
 वदैतद्विधिवद्देव यदि ते वल्लभास्म्यहम् ॥ ३॥ 

ईश्वर उवाच ।
 श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाख्येयमपि ते ध्रुवम् । 
एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं सर्वकामदम् ॥ ४॥ 

यस्य स्मरणमात्रेण न विघ्नाः प्रभवन्ति हि । 
त्रिकालमेककालं वा ये पठन्ति सदा नराः ॥ ५॥

 तेषां क्वापि भयं नास्ति सङ्ग्रामे सङ्कटे गिरौ ।
 भूतवेतालरक्षोभिर्ग्रहैश्चापि न बाध्यते ॥ ६॥

 इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् गणनायकम् । 
न च सिद्धिमाप्नोति मूढो वर्षशतैरपि ॥ ७॥

 अघोरो मे यथा मन्त्रो मन्त्राणामुत्तमोत्तमः ।
 तथेदं कवचं देवि दुर्लभं भुवि मानवैः ॥ ८॥

 गोपनीयं प्रयत्नेन नाज्येयं यस्य कस्यचित् । 
तव प्रीत्या महेशानि कवचं कथ्यतेऽद्भुतम् ॥ ९॥ 

एकाक्षरस्य मन्त्रस्य गणकश्चर्षिरीरितः ।
 त्रिष्टुप् छन्दस्तु विघ्नेशो देवता परिकीर्तिता ॥ १०॥ 

गँ बीजं शक्तिरोङ्कारः सर्वकामार्थसिद्धये ।
 सर्वविघ्नविनाशाय विनियोगस्तु कीर्तितः ॥ ११॥

 ध्यानम् । 
रक्ताम्भोजस्वरूपं लसदरुणसरोजाधिरूढं त्रिनेत्रं पाशं 
चैवाङ्कुशं वा वरदमभयदं बाहुभिर्धारयन्तम् ।
 शक्त्या युक्तं गजास्यं पृथुतरजठरं नागयज्ञोपवीतं देवं 
चन्द्रार्धचूडं सकलभयहरं विघ्नराजं नमामि ॥ १२॥

 कवचम् ।
 गणेशो मे शिरः पातु भालं पातु गजाननः ।
 नेत्रे गणपतिः पातु गजकर्णः श्रुती मम ॥ १३॥ 

कपोलौ गणनाथस्तु घ्राणं गन्धर्वपूजितः ।
 मुखं मे सुमुखः पातु चिबुकं गिरिजासुतः ॥ १४॥ 

जिह्वां पातु गणक्रीडो दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ।
 वाचं विनायकः पातु कष्टं पातु महोत्कटः ॥ १५॥

 स्कन्धौ पातु गजस्कन्धो बाहू मे विघ्ननाशनः ।
 हस्तौ रक्षतु हेरम्बो वक्षः पातु महाबलः ॥ १६॥ 

हृदयं मे गणपतिरुदरं मे महोदरः । 
नाभि गम्भीरहृदयः पृष्ठं पातु सुरप्रियः ॥ १७॥

 कटिं मे विकटः पातु गुह्यं मे गुहपूजितः । 
ऊरु मे पातु कौमारं जानुनी च गणाधिपः ॥ १८॥ 

जङ्घे गजप्रदः पातु गुल्फौ मे धूर्जटिप्रियः ।
 चरणौ दुर्जयः पातुर्साङ्गं गणनायकः ॥ १९॥ 

आमोदो मेऽग्रतः पातु प्रमोदः पातु पृष्ठतः । 
दक्षिणे पातु सिद्धिशो वामे विघ्नधरार्चितः ॥ २०॥

 प्राच्यां रक्षतु मां नित्यं चिन्तामणिविनायकः । 
आग्नेयां वक्रतुण्डो मे दक्षिणस्यामुमासुतः ॥ २१॥

 नैऋत्यां सर्वविघ्नेशः पातु नित्यं गणेश्वरः ।
 प्रतीच्यां सिद्धिदः पातु वायव्यां गजकर्णकः ॥ २२॥ 

कौबेर्यां सर्वसिद्धिशः ईशान्यामीशनन्दनः । 
ऊर्ध्वं विनायकः पातु अधो मूषकवाहनः ॥ २३॥ 

दिवा गोक्षीरधवलः पातु नित्यं गजाननः ।
 रात्रौ पातु गणक्रीडः सन्ध्योः सुरवन्दितः ॥ २४॥

 पाशाङ्कुशाभयकरः सर्वतः पातु मां सदा । 
ग्रहभूतपिशाचेभ्यः पातु नित्यं गजाननः ॥ २५॥ 

सत्वं रजस्तमो वाचं बुद्धिं ज्ञानं स्मृतिं दयाम् ।
 धर्मचतुर्विधं लक्ष्मीं लज्जां कीर्तिं कुलं वपुः ॥ २६॥ 

धनं धान्यं गृहं दारान् पौत्रान् सखींस्तथा ।
 एकदन्तोऽवतु श्रीमान् सर्वतः शङ्करात्मजः ॥ २७॥

 सिद्धिदं कीर्तिदं देवि प्रपठेन्नियतः शुचिः । 
एककालं द्विकालं वापि भक्तिमान् ॥ २८॥

 न तस्य दुर्लभं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
 सर्वपापविनिर्मुक्तो जायते भुवि मानवः ॥ २९॥

 यं यं कामयते नित्यं सुदुर्लभमनोरथम् ।
 तं तं प्राप्नोति सकलं षण्मासान्नात्र संशयः ॥ ३०॥ 

मोहनस्तम्भनाकर्षमारणोच्चाटनं वशम् ।
 स्मरणादेव जायन्ते नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥ 

सर्वविघ्नहरं देवं ग्रहपीडानिवारणम् ।
 सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वापत्तिनिवारणम् ॥ ३२॥

 धृत्वेदं कवचं देवि यो जपेन्मन्त्रमुत्तमम् ।
 न वाच्यते स विघ्नौघैः कदाचिदपि कुत्रचित् ॥ ३३॥

 भूर्जे लिखित्वा विधिवद्धारयेद्यो नरः शुचिः । 
एकबाहो शिरः कण्ठे पूजयित्वा गणाधिपम् ॥ ३४॥

 एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं देवि दुर्लभम् ।
 यो धारयेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते ॥ ३५॥ 

गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ।
 पठेद्वा पाठयेद्वापि तस्य सिद्धिः करे स्थिता ॥ ३६॥

 न प्रकाश्यं महेशानि कवचं यत्र कुत्रचित् । 
दातव्यं भक्तियुक्ताय गुरुदेवपराय च ॥ ३७॥ 

॥ इति श्रीरुद्रयामले एकाक्षरगणपतिकवचं सम्पूर्णम् ॥

Sunday, August 13, 2017

5245th Birth Anniversary of Lord Krishna



Krishna Janmashtami


Krishna Janmashtami, also known as Krishnashtami, Saatam Aatham, Gokulashtami, Ashtami Rohini, Srikrishna Jayanti, Sree Jayanti or sometimes simply as Janmashtami, is an annual celebration of the birth of the Hindu deity Krishna, the eighth avatar of Vishnu.

Hindus across India and abroad are gearing up for one of their most significant festivals - Janmashtami. This year Janmashtami would be celebrated on 14th August. Janmashtami marks the birth of Lord Krishna. It is said that Lord Krishna was born at midnight on the 'eighth day' or the 'Ashtami' of the holy month, Shravana, according to the Hindu Lunar calendar.

Significance of Janmashtami

The Kingdom of Mathura was under deep peril and melancholy under the rule of King Kansa. The ruthless king had a sister known as Princess Devaki, whom he loved dearly. He married his little sister to Vasudeva with much grandeur and magnificence, when suddenly the cloud roared with a prophecy that the eighth son of Devaki & Vasudev would be the cause of his death. The merciless king took over the loving brother and he immediately threw Devaki and Vasudev into the prison or 'Karaghar'.

The cruel king went on to kill all the six children that Devaki had borne in all those years. However, the seventh child who was informed to be miscarried was mystically transferred to the womb of Princess Rohini in Vrindavan who grew up to become Balram, the elder brother of Lord Krishna. During the birth of Lord Krishna, Vasudev was guided by the Gods and carried the baby to Vrindavan to the house of Nanda and Yasoda. It was a night of frightening thunderstorm and heavy downpour. But Vasudev kept walking with Krishna over his head in a basket, braving the storm and the choppy river.

To protect Krishna, Shesh Nag (the Snake God) also quietly rose from behind to cover his lord from the rains, as Vasudeva made his way. When he reached Nanda's place, Vasudeva kept his son and returned with their girl child born on the same day to present her to King Kansa in the hope that he wouldn't harm her because the prophecy had said that the eighth 'son' would be the one to kill him. But the merciless Kansa held the child and tried to throw her against a rock when she rose to the air taking the form of Goddess Durga, warning him about his death. And sure enough, years later, Krishna took the life of Kansa and Mathura was reinstated as a happy kingdom once again.
The Janmashtami Fast, Bhog and Pooja Rituals

Devotees of Lord Krishna observe a ritualistic fast during his birth anniversary. Devotees eat only a single meal a day before Janmashtami. On the fasting day, devotees take a Sankalpa to observe a day long fast and to break it on the next day when the Ashtami Tithi is over. They perform the Krishna Abhishekam, with milk, ghee and water, and proceed to offer 'bhog' to the God. Through the day of fasting no grains are consumed, the devotees take a meal containing fruits and water, called 'Phallar'.

The Chappan Bhog

As a common practice, after sundown, they recite hymns and sing bhajans in the name of the Lord and break their fast only after midnight. The following day, which is referred to as 'Nanda Utsav', as an offering to the Lord, devotees put together a list of 56 food items, which is referred to as the 'Chappan Bhog'. This is later distributed among the people after the fast. As legend goes, it constitutes Krishna's favourite dishes and usually includes cereals, fruits, dry fruits, sweets, drinks, namkeen and pickles in quantities of eight under each category. Some of the common items which are found in the bhog are makhan mishri, kheer, rasgulla, jalebi, rabri, mathri, malpua, mohanbhog, chutney, murabba, saag, dahi, Khichadi, tikkis, milk, cashews etc.



Date and Mahurat of Janmashtami Pooja and Fasting


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इस बार जन्माष्टमी 2 और 3 सितंबर को है। कई बार कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगों के लिए और दूसरे दिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगों के लिए होती है। जो कि इस साल भी 2 दिन पड़ रही है। जिसमें पहला दिन अर्थात 2 सितम्बर को स्मार्त की होगी और 3 सितम्बर को वैष्णव संप्रदाय की मनाई जाएगी।
इस साल भी 2 सितंबर को रविवार 8.48 रात तक सप्तमी तिथि है और उसको बाद अष्टमी तिथि शुरू हो जाएगी और रविवार की रात को ही चंद्रमा भी रोहिणी नक्षत्र में उच्च राशि वृषभ मे ही है। इस बार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी रात्रि 8:48 बजे से शुरू होकर अगले दिन 3 सितंबर को रात्रि 07:20 बजे समाप्त हो जाएगी। 3 सितंबर को रात को 7.20 से नवमी तिथि है और मृगशिरा नक्षत्र है। 

Note -
Lord Krishna lived for 125 years. RAJKOT: It's now official. Lord Krishna was born on 21-07-3227 BC and died on 18-02-3102 BC. RAJKOT: It''s now official.


Happy Janmashtami Blog Reader !

Saturday, August 12, 2017

Mata Chintpurni Devi Temple


Chintpurni Maa “Chinta” Means"worry", worries act as a slow poison. Mathaa saves her bhaktas (Devotees)from it, giving tonic of life, by fulfilling their desires and hence rightly known as CHINTAPURNI.  The goddess is also known as the home of Chhinnamastila.

Mata Chintpurni Devi Temple is a major pilgrimage center and one of the Shakti Peethas in India. The Chintpurni shakti peeth (Chhinnamastika shakti peeth) is located in Una district Himachal Pradesh State, surrounded by the western Himalaya in the north and east in the smaller Shiwalik (or Shivalik) range bordering the state of Punjab. The Chintpurni Shakti Peeth houses the temple of Chinnamastika Devi or Chinnamasta Devi. Chhinnamasta or Chinnamastika temple is one of the 7 major and 51 total Shakti Peethas.Here, Chhinnamasta is interpreted as the severed-headed one as well as the foreheaded-one.

In the opinion of the Hindu mythology, Lord Vishnu cut the  skeleton of Shati in to fifty one pieces with his chakra to stop the wrath of lord Shiva. It is believed that the feet of Sati fell in this place where the temple has been built.

A History of the Shri Chintpurni Devi Temple and Bhakta Mai Das

Pandit Mai Das , a Kalia Saraswat Brahman, is generally believed to have established this shrine to Mata Chintpurni Devi in Chhaproh village twenty-six generations ago. Over time this village became known as Chintpurni after the eponymous deity. His descendants still live in Chintpurni and perform archana and puja at the Chintpurni temple.

According to the Kalia family lore, Bhakta Mai Das's father lived in Athoor village in the princely state of Patiala. He was an ardent devotee of Goddess Durga. He had three sons called Devi Das, Durga Das and Mai Das. The youngest one was Mai Das. For various reasons, the family moved to village Rapoh Muchalian, near Amb (now in District Una, Himachal Pradesh). Just like his father, Mai Das was an intense devotee of goddess Durga and spent much of his time in Durga puja, bhajan and kirtan. His brothers were not too happy with him as Mai Das did not spend much time on affairs of this world. However his father made sure that his worldly needs were met.

Mai Das had got married when his father was still alive. After the father died, the brothers refused to provide any financial support to him. They told him to look after himself and his immediate family. Mai Das had to face many difficulties after he separated from his brothers. However his faith and devotion to Mother Durga remained steadfast as he sincerely believed that Durgaji removes all difficulties for her devotees.

Once Bhakta Mai Das was travelling to the village of his in-laws. After a long and tiring walk, he sat down to rest under a Vat tree (banyan tree, Ficus Bengalensis) in a densely forested area. He dozed off and started dreaming. A luminous and beautiful young girl appeared in his dream and said to him, " Mai Das, stay in this place and serve me. That will be best for you." Mai Das woke up with a start and looked around. He could not see any other person nearby and felt quite confused.

Bhakta Mai Das continued on to his in-laws' house. He was still thinking about his dream. Was that really the Devi? If so, how would he carry out the Devi's command? He arrived at the in-laws' house but did not stay there for long as his mind was quite unsettled.

On his way back, he sat down under the same Vat tree and began to concentrate his thoughts on Durga Mata. He prayed, "O Mother, I have but a small mind and cannot comprehend your powers. If you consider me a true devotee, please manifest yourself and allay my doubts". Upon hearing Mai Das's prayer, Durga Mata manifested herself in her luminous Chaturbhuj form sitting astride a lion. Mai Das fell to the Devi's feet and prayed, "O Bhagavati, do command me. How may I serve you that my life be best spent at your lotus feet?"

Durga Mata said, "I have been living at this very place for many, many years but in the Kali Yug people had neglected this spot. I will now appear under this tree in the form of a pindi (a round stone). Ensure that puja is performed here every day regularly."

Mai Das was still somewhat reluctant to live there as panthers and other wild animals abounded in the dense forest. Also as that spot was on a hill-top, there was no known source of water nearby. Durga Mata pointed to a place on the northern slope of the hill and told him to dig out a stone under which he would find a spring of fresh water.

She gave him a mantra - Namaskar mantra, so that he would have no fear.

"Om em kleem hreem shri bhayanaashini hoon hoon phat Swaha" 

 She also gave him the Mool Mantra 

"om em hreem kleem ChamunDaay Vichchayah".

She said, "In the past I have been known as Chhinnamastika. From now on people will also call me Chintapurni as I have removed all your doubts and worries. My devotees will arrange to have a temple built here. Whatever offerings are made should be sufficient for you and your descendants. " The Goddess gave him a few other instructions and disappeared.

Mai Das went to the spot to which Devi had pointed and looked for water. His joy knew no bounds when he removed the stone and a stream of crystal clear and sweet water gushed forth.

A water tank was built there subsequently. Water from this tank is reserved for the use of the Temple.
Bhakta Mai Das built a small hut for himself near the water tank and began regular worship of the Devi's pindi at the hill-top. After a few years devotees built a small temple which has gradually been expanded.

Twenty six generations later, his descendants continue to offer worship to Shri Chintpurni Devi. The forest cover has diminished considerably. Descendants of Pandit Mai Dass form a majority of the inhabitants of Chintpurni village. Although the village is still called Chhaproh in government land records, it is generally known as Chintpurni after the Devi who resides there.

Tales about the miraculous powers of the Devi have spread far and wide. Thousand of devotees visit the temple every year and particularly so during the Navaratras in Shravan (July - August), Ashvin (September - October) and Chaitra (March-April). Sankranti, Purnima and Ashtami are the other popular days.



जय माता दी !

Sunday, August 6, 2017

श्री शिव चालीसा (Shri Shiv Chalisa)

हिन्दू धर्म में त्रिदेवों की कल्पना की गई है। मान्यता है कि यही त्रिदेव विश्व के रचयिता, संचालक और पालक हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव को संहारक माना गया है। शिवजी को उनके भोले स्वभाव के कारण भोलेनाथ भी कहा जाता है। कहा जाता है कि शिवजी की आराधना करने वाले जातक मृत्यु का भय भी नहीं सताता।

शिवजी की आराधना के लिए सबसे आसान मंत्र है "ऊं नम: शिवाय"। इस मंत्र के साथ शिवजी की पूजा में शिव चालीसा का भी उपयोग किया जाता है। शिव चालीसा हिन्दू धार्मिक पुस्तकों में भी वर्णित है।


।।दोहा।।

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥1॥

मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥2॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥3॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥4॥

प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥5॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥6॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥7॥

धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥8॥

नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥9॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥10॥

कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥


Thursday, August 3, 2017

श्री त्रिपुरसुन्दरी

श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम् स्तोत्रं


श्रीसेव्य-पादकमले श्रित-चन्द्र-मौले
श्रीचन्द्रशेखर-यतीश्वर-पूज्यमाने
श्रीखण्ड-कन्दुककृत-स्व-शिरोवतंसे
श्रीमन्महात्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥१॥

उत्तिष्ठ तुङ्ग-कुलपर्वत-राज-कन्ये 
उत्तिष्ठ भक्त-जन-दुःख-विनाश-दक्षे
उत्तिष्ठ सर्व-जगती-जननि प्रसन्ने 
उत्तिष्ठ हे त्रिपुरसुन्दरि सुप्रभातम् ॥२॥

उत्तिष्ठ राजत-गिरि-द्विषतो रथात् त्वं 
उत्तिष्ठ रत्न-खचितत् ज्वलिताच्च पीठात्
उत्तिष्ठ बन्धन-सुखं परिधूय शंभोः 
उत्तिष्ठ विघ्नित-तिरस्करिणीं विपाट्य ॥३॥

यत्पृष्ठभागमवलम्ब्य विभाति लक्ष्मीः
यस्या वसन्ति निखिला अमराश्च देहे
स्नात्वा विशुद्धहृदया कपिला सवत्सा
सिद्धा प्रदर्शयितुमिह नस्तव विश्वरूपम् ॥४॥

आकर्ण्यतेऽद्य मदमत्त-गजेन्द्रनादः
त्वं बोध्यसे प्रतिदिनं मधुरेण येन
भूपालरागमुखरा मुखवाद्यवीणा
भेरीध्वनिश्च कुरुते भवतीं प्रबुद्धाम् ॥५॥

त्वां सेवितुं विविध-रत्न-सुवर्ण-रूप्य-
खाद्यम्बरैः कुसुम-पत्र-फलैश्च भक्ताः
श्रद्धान्विताः जननि विस्मृत-गृह्य-बन्धाः
आयान्ति भारत-निवासि-जनाः सवेगम् ॥६॥

जीवातवः सुकृतिनः श्रुतिरूपमातुः
विप्राः प्रसन्न-मनसो जपितार्क-मन्त्राः
श्रीसूक्त-रुद्र-चमकाद्यवधारणाय
सिद्धाः महेश-दयिते तव सुप्रभातम् ॥७॥

फालप्रकासि-तिलकाङ्क-सुवासिनीनां
कर्पूर-भद्र-शिखया तव दृष्टि-दोषम्
गोष्ठी विभाति परिहर्तुमनन्यभावा
हे देवि पङ्क्तिश इयं तव सुप्रभातम् ॥८॥

उग्रः सहस्र-किरणोऽपि करं समर्प्य 
त्वत्तेजसः पुरत एष विलज्जितः सन्
रक्तस्तनावुदयमेत्यगपृष्ठलीनः पद्मं 
त्वदास्यसहजं कुरुते प्रसन्नम् ॥९॥

नृत्यन्ति बर्हनिवहं शिखिनः प्रसार्य
गायन्ति पञ्चमगतेन पिकाः स्वरेण
आस्ते तरङ्गतति-वाद्य-मृदङ्ग-नादः
तौर्यत्रिकं शुभमकृत्रिममस्तु तुभ्यम् ॥१०॥

संताप-पाप-हरणे त्वयि दीक्षितायां
संताप-हारि-शशि-पापहरापगाभ्याम्
कुत्रापि धूर्जटि-जटा-विपिने निलीनं
छिन्ना सरित् क्षयमुपैति विधुश्च वक्रः ॥११॥

भुक्त्वा कुचेल-पृतुकं ननु गोपबालः
आकर्ण्य ते व्यरचयत् सुहृदं कुबेरम्
व्याजस्य नास्ति तव रिक्त-जनादपेक्षा
निर्व्याजमेव करुणां नमते तनोषि ॥१२॥

प्राप्नोति वृद्धिमतुलां पुरुषः कटाक्षैः 
द्वन्द्वी ध्रुवं क्षयमुपैति न चात्र शङ्का
मित्रस्तवोषसि पदं परिसेव्य वृद्धः
चन्द्रस्त्वदीय-मुखशत्रुतया विनष्टः ॥१३॥

सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साक्षिणि विश्व-मातः
स्वर्गापवर्ग-फल-दायनि शंभु-कान्ते
श्रुत्यन्तखेलिनि विपक्ष-कठोर-वज्रे 
भद्रे प्रसन्न-हृदये तव सुप्रभातम् ॥१४॥

मातः स्वरूपमनिशं हृदि पश्यतां ते
को वा न सिद्ध्यति मनश्चिर-कांक्षितार्थः
सिद्ध्यन्ति हन्त धरणी-धन-धान्य-धाम-
धी-धेनु-धैर्य-धृतयः सकलाः पुमार्थाः ॥१५॥

इति श्रीत्रिपुरसुन्दरी सुप्रभातम्


अष्ट सिद्धियाँ


सिद्धियाँ 8 प्रकार की होती हैं 

1. अणिमा - जिसके पास ये सिद्धि होती है वो व्यक्ति अपने शरीर को अनु या एटम जितना छोटा बना सकता      है।
2. महिमा - इस सिद्धि से व्यक्ति अपने शरीर को जितना चाहे बड़ा बना सकता है।
3. गरिमा - इस सिद्धि से व्यक्ति अपने शरीर को जितना चाहे उतना भारी कर सकता है।
4. लघिमा - इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को बिलकुल हल्का बना सकता है ।
5. प्राप्ति - इस सिद्धि से व्यक्ति किसी भी स्थान में बिना रोक टोक जा सकता हैं।
6. प्राकाम्य - इस सिद्धि को प्राप्त करने से मनुष्य जिस भी चीज की इच्छा करता है वो उसे प्राप्त कर लेता है  ।7. इशित्वा - इस सिद्धि की प्राप्ति से मनुष्य किसी भी व्यक्ति पर स्वामित्व प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।
8. वशित्वा - इस सिद्धि को प्राप्त करने से मनुष्य हर प्रकार के युद्ध में विजय प्राप्त करता है ।

देवी माँ सिद्धिदात्री की कृपा से इन 8 सिद्धियों को प्राप्त किया जा सकता है

देवी दुर्गा जी के नौवें रूप का नाम देवी सिद्धिधात्री है , वे सभी प्रकार की सिद्धियों को देने में समर्थ हैं।

मार्कंडेय पुराण के अनुसार आठ प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्वा, वाशित्वा।

इनकी पूजा करने से साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति होती है साधक का संपूर्ण जगत पर अधिकार हो जाता है उसके लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता।




Monday, July 24, 2017

Shiva the Supreme : What is Linga or Lingam ?



The frame of the cosmic reality, according to ancient Hindu thought, consists of the three fundamental states called evolution (Shrishthi), existence (sthiti), and involution (samhara) that acts in a cyclic process of infinity. Each one of the forms is controlled by a God, named Brahma (the creator), Vishnu (the preserver) and Siva/Shiva (the destroyer); these three Gods are called the Trinity. Shiva, being the last to complete the cycle from where the new cycle starts, is known as Mahadeo, the Supreme Divinity. The iconographic form of the Shiva, the Linga represents the unity of the three states of cosmos (shown in above figure).The Linga consists of the three parts. The first is a square base of three-layers at the bottom showing the three mythical realms (lokas), symbolizing evolution the place of Brahma. The second is an octagonal round form in the middle showing the eight directions, symbolizing existence or perseverance the place of Vishnu; and third is a cylinder at the top with a spherical end, symbolizing involution or completion of the cosmic cycle the place of Shiva. This icon shows the supreme state of integrity, the ultimate form of Shiva linga itself is a symbol of cosmic mandala. As Sadasiva (eternal reality) Shiva is represented as linga, standing also for 'total knowledge'. As Rudra, the destroyer, his consort is Kali. As Bhairava, the terrible destroyer, his consort is Durga. As a jovial god living in the Himalaya his wife is Parvati. As possessor of all forms of divine power Shiva rooms at the bottom of everything that is moving, that is how he is called Ishvara, derived from I-cara, i.e. I the centre, and cara, the rhythm of movement. Shiva is also depicted as cosmic dancer, Tandava Nartakari, the one who keeps up the rhythm of the world in cosmos.

Special Note: 

Above all information regarding Shivlinga and it's description has been taken from "The Linga Puran". 


Wednesday, July 19, 2017

श्रावण मॉस में दिन अनुसार शिव पूजा का फल

रविवार- पाप नाशक
सोमवार- धन लाभ
मंगलवार- स्वस्थ्य लाभ, रोग निवारण
बुधवार- पुत्र प्राप्ति
गुरूवार- आयु कारक
शुक्रवार- इन्द्रिय सुख
शनिवार- सर्व सुखकारी



श्रावण मॉस में शिव पूजा हेतु शास्त्रोक्त उत्तम स्थान

  • तुलसी, पीपल व वट वृक्ष के समीप 
  • नदी, सरोवर का तट, पर्वत की चोटी, सागर तीर 
  • मंदिर, आश्रम, तीर्थ अथवा धार्मिक स्थल, पावन धाम, गुरु की शरण


शिव पूजा व पुष्प


  • बिल्वपत्र- जन्म जन्मान्तर के पापो से मुक्ति (पूर्व जन्म के पाप आदि) 
  • कमल- मुक्ति, धन, शांति प्रदायक 
  • कुशा- मुक्ति प्रदायक 
  • दूर्वा- आयु प्रदायक 
  • धतूरा- पुत्र सुख प्रदायक 
  • आक- प्रताप वृद्धि 
  • कनेर- रोग निवारक 
  • श्रंघार पुष्प- संपदा वर्धक 
  • शमी पत्र- पाप नाशक
  • शिव अभिषेक व पूजा में प्रयुक्त द्रव्य विशेष के फल-
  • मधु- सिद्धि प्रद
  • दुग्ध से- समृद्धि दायक 
  • कुषा जल- रोग नाशक 
  • ईख रस- मंगल कारक 
  • गंगा जल- सर्व सिद्धि दायक 
  • ऋतू फल के रस- धन लाभ


शिव आराधना के मंत्र व अनुष्ठान

|| नमोस्तुते शंकरशांतिमूर्ति | नमोस्तुते चन्द्रकलावत्स ||
|| नमोस्तुते कारण कारणाय | नमोस्तुते कर्भ वर्जिताय ||

अथवा

|| ॐ नमस्तुते देवेशाय नमस्कृताय भूत भव्य महादेवाय हरित पिंगल लोचनाय ||

अथवा

|| ॐ नमो भगवते रुद्राय नमः ||

अथवा
|| ॐ दक्षिणा मूर्ति शिवाय नमः ||

अथवा

|| ॐ दारिद्र्य दुःख दहनाय नम: शिवाय ||

अथवा

|| वृषवाहनः शिव शंकराय नमो नमः | ओजस्तेजो सर्वशासकः शिव शंकराय नमो नमः ||


ॐ नमः शिवाय

Tuesday, July 18, 2017

शिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥
ॐ नम: शिवाय

Monday, July 17, 2017

श्रीकालिकाष्टकम्


धयानम्

गलद् रक्तमण्डावलीकण्ठमाला महाघोररावा सुदंष्ट्रा कराला ।
विवस्त्रा श्मशानलया मुक्तकेशी महाकालकामाकुला कालिकेयम् ॥१॥
भजे वामयुग्मे शिरोsसिं दधाना वरं दक्षयुग्मेsभयं वै तथैव ।
सुमध्याsपि तुङ्गस्तनाभारनम्रा लसद् रक्तसृक्कद्वया सुस्मितास्या ॥२॥
शवद्वन्द्वकर्णावतंसा सुकेशी लसत्प्रेतपाणिं प्रयुक्तैककाञ्ची ।
शवाकारमञ्चाधिरूढा शिवाभि-श्चतुर्दिक्षशब्दायमानाsभिरेजे ॥३॥

स्तुति:

विरञ्च्यादिदेवास्त्रयस्ते गुणांस्त्रीन् समाराध्य कालीं प्रधाना बभूवु: ।
अनादिं सुरादिं मखादिं भवादिं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥४॥
जगन्मोहनीयं तु वाग्वादिनीयं सुहृत्पोषिणीशत्रुसंहारणीयम् ।
वचस्तम्भनीयं किमुच्चाटनीयं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥५॥
इयं स्वर्गदात्री पुन: कल्पवल्ली मनोजांस्तु कामान् यथार्थं प्रकुर्यात् ।
तथा ते कृतार्था भवन्तीति नित्यं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥६॥
सुरापानमत्ता सभुक्तानुरक्ता लसत्पूतचित्ते सदाविर्भवत्ते ।
जपध्यानपूजासुधाधौतपङ्का स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥७॥
चिदान्दकन्दं हसन् मन्दमन्दं शरच्चन्द्रकोटिप्रभापुञ्जबिम्बम् ।
मुनीनां कवीनां हृदि द्योतयन्तं स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा:॥८॥
महामेघकाली सुरक्तापि शुभ्रा कदाचिद् विचित्राकृतिर्योगमाया ।
न बाला न वृद्धा न कामातुरापि स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥९॥
क्षमस्वापराधं महागुप्तभावं मया लोकमध्ये प्रकाशीकृत यत् ।
तव ध्यानपूतेन चापल्यभावात् स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥१०॥

फलश्रुति:

यदि ध्यानयुक्तं पठेद् यो मनुष्य-स्तदा सर्वलोके विशालो भवेच्च ।
गृह चाष्टसिद्धिर्मृते चापि मुक्ति: स्वरूपं त्वदीयं न विन्दन्ति देवा: ॥११॥


॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीकालिकाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

Sunday, July 16, 2017

शिव उपासना “रुद्राष्टकम” का हिंदी अनुवाद


आपके लिए रुद्राष्टकम का हिंदी अनुवाद निम्न पंक्तियों में लिखा गया हैं

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥1॥

हे भगवन ईशान को मेरा प्रणाम, ऐसे भगवान जो कि निर्वाण रूप हैं जो कि महान ॐ के दाता हैं जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्यापत हैं जो अपने आपको धारण किये हुए हैं जिनके सामने गुण अवगुण का कोई महत्व नहीं, जिनका कोई विकल्प नहीं, जो निष्पक्ष हैं जिनका आकार आकाश के सामान हैं जिसे मापा नहीं जा सकता उनकी मैं उपासना करता हूँ ।

निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं
गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥

जिनका कोई आकार नहीं, जो ॐ के मूल हैं, जिनका कोई राज्य नहीं, जो गिरी के वासी हैं, जो कि सभी ज्ञान, शब्द से परे हैं, जो कि कैलाश के स्वामी हैं, जिनका रूप भयावह हैं, जो कि काल के स्वामी हैं, जो उदार एवम् दयालु हैं, जो गुणों का खजाना हैं, जो पुरे संसार के परे हैं उनके सामने मैं नत मस्तक हूँ ।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं
मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा
लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥

जो कि बर्फ के समान शील हैं, जिनका मुख सुंदर हैं, जो गौर रंग के हैं जो गहन चिंतन में हैं, जो सभी प्राणियों के मन में हैं, जिनका वैभव अपार हैं, जिनकी देह सुंदर हैं, जिनके मस्तक पर तेज हैं जिनकी जटाओ में लहलहारती गंगा हैं, जिनके चमकते हुए मस्तक पर चाँद हैं और जिनके कंठ पर सर्प का वास हैं ।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं
प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं
प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥

जिनके कानों में बालियाँ हैं, जिनकी सुन्दर भोहे और बड़ी-बड़ी आँखे हैं जिनके चेहरे पर सुख का भाव हैं जिनके कंठ में विष का वास हैं जो दयालु हैं, जिनके वस्त्र शेर की खाल हैं, जिनके गले में मुंड की माला हैं ऐसे प्रिय शंकर पुरे संसार के नाथ हैं उनको मैं पूजता हूँ ।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥

जो भयंकर हैं, जो परिपक्व साहसी हैं, जो श्रेष्ठ हैं अखंड है जो अजन्मे हैं जो सहस्त्र सूर्य के सामान प्रकाशवान हैं जिनके पास त्रिशूल हैं जिनका कोई मूल नहीं हैं जिनमे किसी भी मूल का नाश करने की शक्ति हैं ऐसे त्रिशूल धारी माँ भगवती के पति जो प्रेम से जीते जा सकते हैं उन्हें मैं वन्दन करता हूँ ।

कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी
सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी
प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥

जो काल के बंधे नहीं हैं, जो कल्याणकारी हैं, जो विनाशक भी हैं,जो हमेशा आशीर्वाद देते है और धर्म का साथ देते हैं, जो अधर्मी का नाश करते हैं, जो चित्त का आनंद हैं, जो जूनून हैं जो मुझसे खुश रहे ऐसे भगवान जो कामदेव नाशी हैं उन्हें मेरा प्रणाम ।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं
भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं
प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥७॥

जो यथावत नहीं हैं, ऐसे उमा पति के चरणों में कमल वन्दन करता हैं ऐसे भगवान को पूरे लोक के नर नारी पूजते हैं, जो सुख हैं, शांति हैं, जो सारे दुखो का नाश करते हैं जो सभी जगह वस् करते हैं ।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं
प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥८॥

मैं कुछ नहीं जानता, ना योग, ना ध्यान हैं देव के सामने मेरा मस्तक झुकता हैं, सभी संसारिक कष्टों, दुःख दर्द से मेरी रक्षा करे. मेरी बुढ़ापे के कष्टों से से रक्षा करें । मैं सदा ऐसे शिव शम्भु को प्रणाम करता हूँ ।

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥

इस रुद्राष्टक को जो सच्चे भाव से पढ़ता हैं शम्भुनाथ उसकी सुनते हैं और आशीर्वाद देते है ।

इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् ।
महाकवि तुलसीदास जी का रुद्राष्टक समाप्त होता हैं |

मेरा जितना सामर्थ्य था मैंने यह कठिन अनुवाद किया अगर मुझसे कोई भी गलती हुई हैं तो क्षमा करे एवं मार्गदर्शन दे !

Thursday, July 13, 2017

बिल्वपत्र चढाने के 108 मन्त्र


त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।
त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥
त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
तव पूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥
सर्वत्रैलोक्यकर्तारं सर्वत्रैलोक्यपालनम् ।
सर्वत्रैलोक्यहर्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥
नागाधिराजवलयं नागहारेण भूषितम् ।
नागकुण्डलसंयुक्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥
अक्षमालाधरं रुद्रं पार्वतीप्रियवल्लभम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥
त्रिलोचनं दशभुजं दुर्गादेहार्धधारिणम् ।
विभूत्यभ्यर्चितं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥
त्रिशूलधारिणं देवं नागाभरणसुन्दरम् ।
चन्द्रशेखरमीशानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥
गङ्गाधराम्बिकानाथं फणिकुण्डलमण्डितम् ।
कालकालं गिरीशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥
शुद्धस्फटिक सङ्काशं शितिकण्ठं कृपानिधिम् ।
सर्वेश्वरं सदाशान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९॥
सच्चिदानन्दरूपं च परानन्दमयं शिवम् ।
वागीश्वरं चिदाकाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०॥
शिपिविष्टं सहस्राक्षं कैलासाचलवासिनम् ।
हिरण्यबाहुं सेनान्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥११॥
अरुणं वामनं तारं वास्तव्यं चैव वास्तवम् ।
ज्येष्टं कनिष्ठं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१२॥
हरिकेशं सनन्दीशं उच्चैर्घोषं सनातनम् ।
अघोररूपकं कुम्भं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१३॥
पूर्वजावरजं याम्यं सूक्ष्मं तस्करनायकम् ।
नीलकण्ठं जघन्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१४॥
सुराश्रयं विषहरं वर्मिणं च वरूधिनम् I
महासेनं महावीरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१५॥
कुमारं कुशलं कूप्यं वदान्यञ्च महारथम् ।
तौर्यातौर्यं च देव्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१६॥
दशकर्णं ललाटाक्षं पञ्चवक्त्रं सदाशिवम् ।
अशेषपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१७॥
नीलकण्ठं जगद्वन्द्यं दीननाथं महेश्वरम् ।
महापापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१८॥
चूडामणीकृतविभुं वलयीकृतवासुकिम् ।
कैलासवासिनं भीमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१९॥
कर्पूरकुन्दधवलं नरकार्णवतारकम् ।
करुणामृतसिन्धुं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२०॥
महादेवं महात्मानं भुजङ्गाधिपकङ्कणम् ।
महापापहरं देवं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२१॥
भूतेशं खण्डपरशुं वामदेवं पिनाकिनम् ।
वामे शक्तिधरं श्रेष्ठं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२२॥
फालेक्षणं विरूपाक्षं श्रीकण्ठं भक्तवत्सलम् ।
नीललोहितखट्वाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२३॥
कैलासवासिनं भीमं कठोरं त्रिपुरान्तकम् ।
वृषाङ्कं वृषभारूढं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२४॥
सामप्रियं सर्वमयं भस्मोद्धूलितविग्रहम् ।
मृत्युञ्जयं लोकनाथं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२५॥
दारिद्र्यदुःखहरणं रविचन्द्रानलेक्षणम् ।
मृगपाणिं चन्द्रमौळिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२६॥
सर्वलोकभयाकारं सर्वलोकैकसाक्षिणम् ।
निर्मलं निर्गुणाकारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२७॥
सर्वतत्त्वात्मकं साम्बं सर्वतत्त्वविदूरकम् ।
सर्वतत्त्वस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२८॥
सर्वलोकगुरुं स्थाणुं सर्वलोकवरप्रदम् ।
सर्वलोकैकनेत्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II२९॥
मन्मथोद्धरणं शैवं भवभर्गं परात्मकम् ।
कमलाप्रियपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३०॥
तेजोमयं महाभीमं उमेशं भस्मलेपनम् ।
भवरोगविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३१॥
स्वर्गापवर्गफलदं रघुनाथवरप्रदम् ।
नगराजसुताकान्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३२॥
मञ्जीरपादयुगलं शुभलक्षणलक्षितम् ।
फणिराजविराजं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३३॥
निरामयं निराधारं निस्सङ्गं निष्प्रपञ्चकम् ।
तेजोरूपं महारौद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३४॥
सर्वलोकैकपितरं सर्वलोकैकमातरम् ।
सर्वलोकैकनाथं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३५॥
चित्राम्बरं निराभासं वृषभेश्वरवाहनम् ।
नीलग्रीवं चतुर्वक्त्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३६॥
रत्नकञ्चुकरत्नेशं रत्नकुण्डलमण्डितम् ।
नवरत्नकिरीटं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३७॥
दिव्यरत्नाङ्गुलीस्वर्णं कण्ठाभरणभूषितम् ।
नानारत्नमणिमयं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३८॥
रत्नाङ्गुलीयविलसत्करशाखानखप्रभम् ।
भक्तमानसगेहं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II३९॥
वामाङ्गभागविलसदम्बिकावीक्षणप्रियम् ।
पुण्डरीकनिभाक्षं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४०॥
सम्पूर्णकामदं सौख्यं भक्तेष्टफलकारणम् ।
सौभाग्यदं हितकरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४१॥
नानाशास्त्रगुणोपेतं स्फुरन्मङ्गल विग्रहम् ।
विद्याविभेदरहितं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४२॥
अप्रमेयगुणाधारं वेदकृद्रूपविग्रहम् ।
धर्माधर्मप्रवृत्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४३॥
गौरीविलाससदनं जीवजीवपितामहम् ।
कल्पान्तभैरवं शुभ्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४४॥
सुखदं सुखनाशं च दुःखदं दुःखनाशनम् ।
दुःखावतारं भद्रं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४५॥
सुखरूपं रूपनाशं सर्वधर्मफलप्रदम् ।
अतीन्द्रियं महामायं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४६॥
सर्वपक्षिमृगाकारं सर्वपक्षिमृगाधिपम् ।
सर्वपक्षिमृगाधारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४७॥
जीवाध्यक्षं जीववन्द्यं जीवजीवनरक्षकम् ।
जीवकृज्जीवहरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४८॥
विश्वात्मानं विश्ववन्द्यं वज्रात्मावज्रहस्तकम् ।
वज्रेशं वज्रभूषं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II४९॥
गणाधिपं गणाध्यक्षं प्रलयानलनाशकम् ।
जितेन्द्रियं वीरभद्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५०॥
त्र्यम्बकं मृडं शूरं अरिषड्वर्गनाशनम् ।
दिगम्बरं क्षोभनाशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५१॥
कुन्देन्दुशङ्खधवलं भगनेत्रभिदुज्ज्वलम् ।
कालाग्निरुद्रं सर्वज्ञं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५२॥
कम्बुग्रीवं कम्बुकण्ठं धैर्यदं धैर्यवर्धकम् ।
शार्दूलचर्मवसनं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५३॥
जगदुत्पत्तिहेतुं च जगत्प्रलयकारणम् ।
पूर्णानन्दस्वरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५४॥
सर्गकेशं महत्तेजं पुण्यश्रवणकीर्तनम् ।
ब्रह्माण्डनायकं तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५५॥
मन्दारमूलनिलयं मन्दारकुसुमप्रियम् ।
बृन्दारकप्रियतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५६॥
महेन्द्रियं महाबाहुं विश्वासपरिपूरकम् ।
सुलभासुलभं लभ्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ५७॥
बीजाधारं बीजरूपं निर्बीजं बीजवृद्धिदम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५८॥
युगाकारं युगाधीशं युगकृद्युगनाशनम् ।
परेशं बीजनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II५९॥
धूर्जटिं पिङ्गलजटं जटामण्डलमण्डितम् ।
कर्पूरगौरं गौरीशं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६०॥
सुरावासं जनावासं योगीशं योगिपुङ्गवम् ।
योगदं योगिनां सिंहं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६१॥
उत्तमानुत्तमं तत्त्वं अन्धकासुरसूदनम् ।
भक्तकल्पद्रुमस्तोमं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६२॥
विचित्रमाल्यवसनं दिव्यचन्दनचर्चितम् ।
विष्णुब्रह्मादि वन्द्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६३॥
कुमारं पितरं देवं श्रितचन्द्रकलानिधिम् ।
ब्रह्मशत्रुं जगन्मित्रं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६४॥
लावण्यमधुराकारं करुणारसवारधिम् ।
भ्रुवोर्मध्ये सहस्रार्चिं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६५॥
जटाधरं पावकाक्षं वृक्षेशं भूमिनायकम् ।
कामदं सर्वदागम्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II६६॥
शिवं शान्तं उमानाथं महाध्यानपरायणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६७॥
वासुक्युरगहारं च लोकानुग्रहकारणम् ।
ज्ञानप्रदं कृत्तिवासं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६८॥
शशाङ्कधारिणं भर्गं सर्वलोकैकशङ्करम् I
शुद्धं च शाश्वतं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६९॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणम् ।
गम्भीरं च वषट्कारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७०॥
भोक्तारं भोजनं भोज्यं जेतारं जितमानसम् I
करणं कारणं जिष्णुं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७१॥
क्षेत्रज्ञं क्षेत्रपालञ्च परार्धैकप्रयोजनम् ।
व्योमकेशं भीमवेषं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७२॥
भवज्ञं तरुणोपेतं चोरिष्टं यमनाशनम् ।
हिरण्यगर्भं हेमाङ्गं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७३॥
दक्षं चामुण्डजनकं मोक्षदं मोक्षनायकम् ।
हिरण्यदं हेमरूपं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७४॥
महाश्मशाननिलयं प्रच्छन्नस्फटिकप्रभम् ।
वेदास्यं वेदरूपं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७५॥
स्थिरं धर्मं उमानाथं ब्रह्मण्यं चाश्रयं विभुम् I
जगन्निवासं प्रथममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७६॥
रुद्राक्षमालाभरणं रुद्राक्षप्रियवत्सलम् ।
रुद्राक्षभक्तसंस्तोममेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७७॥
फणीन्द्रविलसत्कण्ठं भुजङ्गाभरणप्रियम् I
दक्षाध्वरविनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७८॥
नागेन्द्रविलसत्कर्णं महीन्द्रवलयावृतम् ।
मुनिवन्द्यं मुनिश्रेष्ठमेकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II७९॥
मृगेन्द्रचर्मवसनं मुनीनामेकजीवनम् ।
सर्वदेवादिपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II८०॥
निधनेशं धनाधीशं अपमृत्युविनाशनम् ।
लिङ्गमूर्तिमलिङ्गात्मं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८१॥
भक्तकल्याणदं व्यस्तं वेदवेदान्तसंस्तुतम् ।
कल्पकृत्कल्पनाशं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८२॥
घोरपातकदावाग्निं जन्मकर्मविवर्जितम् ।
कपालमालाभरणं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८३॥
मातङ्गचर्मवसनं विराड्रूपविदारकम् ।
विष्णुक्रान्तमनन्तं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८४॥
यज्ञकर्मफलाध्यक्षं यज्ञविघ्नविनाशकम् ।
यज्ञेशं यज्ञभोक्तारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ II८५॥
कालाधीशं त्रिकालज्ञं दुष्टनिग्रहकारकम् ।
योगिमानसपूज्यं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८६॥
महोन्नतमहाकायं महोदरमहाभुजम् ।
महावक्त्रं महावृद्धं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८७॥
सुनेत्रं सुललाटं च सर्वभीमपराक्रमम् ।
महेश्वरं शिवतरं एकबिल्वं शिवार्पणम् II८८॥
समस्तजगदाधारं समस्तगुणसागरम् ।
सत्यं सत्यगुणोपेतं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥ ८९॥
माघकृष्णचतुर्दश्यां पूजार्थं च जगद्गुरोः ।
दुर्लभं सर्वदेवानां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९०॥
तत्रापि दुर्लभं मन्येत् नभोमासेन्दुवासरे ।
प्रदोषकाले पूजायां एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९१॥
तटाकं धननिक्षेपं ब्रह्मस्थाप्यं शिवालयम्
कोटिकन्यामहादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९२॥
दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II९३॥
तुलसीबिल्वनिर्गुण्डी जम्बीरामलकं तथा ।
पञ्चबिल्वमिति ख्यातं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९४॥
अखण्डबिल्वपत्रैश्च पूजयेन्नन्दिकेश्वरम् ।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९५॥
सालङ्कृता शतावृत्ता कन्याकोटिसहस्रकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९६॥
दन्त्यश्वकोटिदानानि अश्वमेधसहस्रकम् ।
सवत्सधेनुदानानि एकबिल्वं शिवार्पणम् II९७॥
चतुर्वेदसहस्राणि भारतादिपुराणकम् ।
साम्राज्यपृथ्वीदानं च एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९८॥
सर्वरत्नमयं मेरुं काञ्चनं दिव्यवस्त्रकम् ।
तुलाभागं शतावर्तं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥९९॥
अष्टोत्तरश्शतं बिल्वं योऽर्चयेल्लिङ्गमस्तके ।
अधर्वोक्तं अधेभ्यस्तु एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१००॥
काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०१॥
अष्टोत्तरशतश्लोकैः स्तोत्राद्यैः पूजयेद्यथा ।
त्रिसन्ध्यं मोक्षमाप्नोति एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०२॥
दन्तिकोटिसहस्राणां भूः हिरण्यसहस्रकम्
सर्वक्रतुमयं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् II१०३॥
पुत्रपौत्रादिकं भोगं भुक्त्वा चात्र यथेप्सितम् ।
अन्ते च शिवसायुज्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०४॥
विप्रकोटिसहस्राणां वित्तदानाच्च यत्फलम् ।
तत्फलं प्राप्नुयात्सत्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०५॥
त्वन्नामकीर्तनं तत्त्वं तवपादाम्बु यः पिबेत्
जीवन्मुक्तोभवेन्नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०६॥
अनेकदानफलदं अनन्तसुकृतादिकम् ।
तीर्थयात्राखिलं पुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०७॥
त्वं मां पालय सर्वत्र पदध्यानकृतं तव ।
भवनं शाङ्करं नित्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१०८॥


ॐ नमः शिवाय

महाकाली महाविजय यन्त्र / कवच धारण से लाभ

१.  महाकाली की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है | स्थायी सम्पत्ति में विशेष वृद्धि होती है और     स्थावर सम्पत्ति विषयक...