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Thursday, August 31, 2017

दुर्गा सप्तशति - Durga Saptashati


Durga Saptashati is a Hindu religious text describing the victory of the goddess Durga over the demon Mahishasura. Durga Saptashati is also known as the Devi Mahatmyam, Chandi Patha (चण्डीपाठः) and contains 700 verses, arranged into 13 chapters.

दुर्गा सप्तशति का कौन सा अध्याय करता है हमारी मनोकामना पूरी और क्या फल है इसके
दुर्गा सप्तशती के अध्याय से कामनापूर्ति-


1- प्रथम अध्याय- हर प्रकार की चिंता मिटाने के लिए।
"The first chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Madhu and Kaitabha' ".

2- द्वितीय अध्याय- मुकदमा झगडा आदि में विजय पाने के लिए।
"The second chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaughter of the armies of Mahishasura' ".

3- तृतीय अध्याय- शत्रु से छुटकारा पाने के लिये।
"The third chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Mahishasura' ".

4- चतुर्थ अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिये।
"The fourth chapter of Durga Saptashati is based on 'Devi Stuti' ".

5- पंचम अध्याय- भक्ति शक्ति तथा दर्शन के लिए।
"The fifth chapter of Durga Saptashati is based on 'Devi's conversation with the messenger' ".

6- षष्ठम अध्याय- डर, शक, बाधा ह टाने के लिये।
"The sixth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Dhumralochana' ".

7- सप्तम अध्याय- हर कामना पूर्ण करने के लिये।
"The seventh chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Chanda and Munda' ".

8- अष्टम अध्याय- मिलाप व वशीकरण के लिये।
"The eighth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Raktabija' ".

9- नवम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामना एवं पुत्र आदि के लिये।
"The ninth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Nishumbha' ".

10- दशम अध्याय- गुमशुदा की तलाश, हर प्रकार की कामनाएवं पुत्र आदि के लिये।
"The tenth chapter of Durga Saptashati is based on 'the slaying of Shumbha' ".

11- एकादश अध्याय- व्यापार व सुख-संपत्ति की प्राप्ति के लिये।
"The eleventh chapter of Durga Saptashati is based on 'Hymn to Narayani' ".

12- द्वादश अध्याय- मान-सम्मान तथा लाभ प्राप्ति के लिये।
"The twelfth chapter of Durga Saptashati is based on 'Eulogy of the Merits' ".

13- त्रयोदश अध्याय- भक्ति प्राप्ति के लिये।
"The thirteenth chapter of Durga Saptashati is based on 'the bestowing of boons to Suratha and Vaisya' ".

ૐ

Thursday, August 24, 2017

गणेश जी के 108 नाम

The Shree Siddhivinayak Ganapati Mandir is a Hindu temple dedicated to Lord Shri Ganesh. It is located in Prabhadevi, Mumbai, Maharashtra.

आधुनिक समय में अधिकतर सभी व्यक्ति किसी ना किसी परेशानी से त्रस्त रह रहे हैं. इस परेशानी को बहुत हद तक कम किया जा सकता है यदि सुबह के समय गणेश जी के 108 नाम लिए जाएँ. गणेश जी को वैसे भी विघ्नहर्त्ता कहा गया है. गणेश जी के 108 नाम और उनके अर्थ निम्नलिखित हैं :-

1)  बालगणपति (Baalganapati) -  सबसे प्रिय बालक
2)  भालचन्द्र (Bhalchandra) -  मस्तक पर चंद्रमा
3)  बुद्धिनाथ (Buddhinath) - बुद्धि के भगवान
4)  धूम्रवर्ण (Dhumravarna) - धुंए को उड़ाने वाला
5)  एकाक्षर (Ekakshar) - एकल अक्षर
6)  एकदन्त (Ekdant) -  एक दांत वाले
7)  गजकर्ण (Gajkarn) - हाथी की आंखें
8)  गजानन (Gajaanan) - हाथी मुँख वाले
9)  गजनान (Gajnaan) -  हाथी के मुख वाले
10)  गजवक्र (Gajvakra) - हाथी जैसा मुंह
11)  गजवक्त्र (Gajvaktra) -
12)  गणाध्यक्ष (Ganaadhyaksha) - गणों का मालिक
13)  गणपति (Ganapati) -  गणों का मालिक
14)  गौरीसुत (Gaurisut) - माता गौरी का बेटा
15)  लम्बकर्ण (Lambakarn) - बड़े कान वाले देव
16)  लम्बोदर (Lambodar) - बड़े पेट वाले
17)  महाबल ( Mahaabal) - अत्यधिक बलशाली
18)  महागणपति (Mahaaganapati) - देवातिदेव
19)  महेश्वर (Maheshwar)  - ब्रह्मांड के भगवान
20)  मंगलमूर्त्ति  (Mangalmurti) -  शुभ कार्य के देव
21)  मूषकवाहन (Mushakvaahan -  जिसका सारथी मूषक
22)  निधिश्वरम (Nidishwaram) -  धन और निधि के दाता
23)  प्रथमेश्वर  (Prathameshwar) -  सब के बीच प्रथम
24)  शूपकर्ण (Shoopkarna) -  बड़े कान वाले देव
25)  शुभम (Shubham) -  शुभ कार्यों के प्रभु
26)  सिद्धिदाता (Siddhidata) -  इच्छाओं के स्वामी
27)  सिद्दिविनायक (Siddhivinaayak) -  सफलता के स्वामी
28)  सुरेश्वरम (Sureshvaram) -  देवों के देव
29)  वक्रतुण्ड (Vakratund) -  घुमावदार सूंड
30)  अखूरथ (Akhurath) -  जिसका सारथी मूषक है
31)  अलम्पत (Alampat) -  अनन्त देव
32)   अमित ( Amit) - अतुलनीय प्रभु
33)  अनन्तचिदरुपम ( Anantchidrupam) -  अनंत चेतना
34)  अवनीश  (Avanish) -  पूरे विश्व के प्रभु
35)  अविघ्न (Avighn) - बाधाओं को हरने वाले
36)  भीम (Bheem) -  विशाल
37)  भूपति ( Bhupati) -  धरती के मालिक
38)  भुवनपति (Bhuvanpati) -  देवों के देव
39)  बुद्धिप्रिय ( Buddhipriya) - ज्ञान के दाता
40)  बुद्धिविधाता (Buddhividhata) -  बुद्धि के मालिक
41)  चतुर्भुज (Chaturbhuj) -  चार भुजाओं वाले
42)  देवदेव (Devdev) -  सभी भगवान में सर्वोपरी
43)  देवांतकनाशकारी (Devantaknaashkari) -  बुराइयों और असुरों के विनाशक
44)  देवव्रत (Devavrat) -  तपस्या स्वीकार करने वाले
45)  देवेन्द्राशिक (Devendrashik) -  सभी देवताओं के रक्षक
46)  धार्मिक (Dharmik) -  दान देने वाला
47)  दूर्जा (Doorja) -  अपराजित देव
48)  द्वैमातुर (Dwemaatur) -  दो माताओं वाले
49)  एकदंष्ट्र  (Ekdanshtra) -  एक दांत वाले
50)  ईशानपुत्र (Ishaanputra) - शिव के बेटे
51)  गदाधर (Gadaadhar) -  जिसका हथियार गदा
52)  गणाध्यक्षिण  (Ganaadhyakshina) - पिंडों के नेता
53)  गुणिन  (Gunin) -  सभी गुणों क ज्ञानी
54)  हरिद्र ( Haridra) -  स्वर्ण के रंग वाला
55)  हेरम्ब (Heramb) -  मां का प्रिय पुत्र
56)  कपिल (Kapil) -  पीले भूरे रंग वाला
57)  कवीश (Kaveesh ) -  कवियों के स्वामी
58)  कीर्त्ति (Kirti) -  यश के स्वामी
59)  कृपाकर ( Kripakar) - कृपा करने वाले
60)  कृष्णपिंगाश (Krishnapingash) -  पीली भूरी आंखवाले
61)  क्षेमंकरी (Kshemankari) -  माफी प्रदान करने वाला
62)  क्षिप्रा (Kshipra) -  आराधना के योग्य
63)  मनोमय  (Manomaya) - दिल जीतने वाले
64)  मृत्युंजय (Mrityunjay) - मौत को हरने वाले
65)  मूढ़ाकरम (Mudhakaram) -  जिन्में खुशी का वास
66)  मुक्तिदायी ( Muktidaayi ) - शाश्वत आनंद के दाता
67)  नादप्रतिष्ठित  (Naadpratishthit) -  जिसे संगीत से प्यार हो
68)  नमस्तेSत  (Namastetu) -  सभी बुराइयों और पापों पर विजय प्राप्त करने वाले
69)  नन्दन (Nandan) -  भगवान शिव का बेटा
70)  पाषिण  (Pashin) -
71)  पीताम्बर (Pitaamber) -  पीले वस्त्र धारक
72)  प्रमोद  (Pramod) - आनंद
73)  पुरुष  (Purush) - अद्भुत व्यक्तित्व
74)  रक्त  (Rakta) -  लाल रंग के शरीर वाला
75)  रुद्रप्रिय  (Rudrapriya) -  शिव के चहेते
76)  सर्वदेवात्मन (Sarvadevatmana) -  सभी स्वर्गीय प्रसाद के स्वीकार्ता
77)  सर्वसिद्धांत (Sarvasiddhanta) -  कौशल और बुद्धि के दाता
78)  सर्वात्मन (Sarvaatmana) - ब्रह्मांड के रक्षक
79)  शांभवि (Shambhavi) -
80)  शशिवर्णम (Shashivarnam) -  रंग चंद्रमा को भाता हो
81)  शुभगुणकानन (Shubhagunakaanan) -  सभी गुण के गुरु
82)  श्वेता (Shweta ) -  जो सफेद रंग में शुद्ध है
83)  सिद्धिप्रिय (Siddhipriya ) -  इच्छापूर्ति वाले
84)  स्कन्दपूर्वज  (Skandapurvaj) - कार्तिकेय के भाई
85)  सुमुख  (Sumukha)-  शुभ मुख वाले
86)  स्वरुप  (Swarup) - सौंदर्य के प्रेमी
87)  तरुण  (Tarun ) - जिसकी कोई आयु न हो
88)  उद्दण्ड  (Uddanda) -  शरारती
89)  उमापुत्र  (Umaputra) - पार्वत के बेटे
90)  वरगणपति  (Varganapati) - अवसरों के स्वामी
91)  वरप्रद  (Varprada) - इच्छाओं के अनुदाता
92)  वरदविनायक  (Varadvinaayak) -  सफलता के स्वामी
93)  वीरगणपति  (Veerganapati) - वीर प्रभु
94)  विद्यावारिधि  (Vidyavaaridhi) - बुद्धि की देव
95)  विघ्नहर  (Vighnahar) - बाधाओं को दूर करने वाले
96)  विघ्नहर्त्ता  (Vighnahartta) - बुद्धि की देव
97)  विघ्नविनाशन  (Vighnavinashan) - बाधाओं के नाशक
98)  विघ्नराज  (Vighnaraaj) - सभी बाधाओं के मालिक
99)  विघ्नराजेन्द्र  (Vighnaraajendra) - बाधाओं के भगवान
100)  विघ्नविनाशाय  (Vighnavinashay) - बाधाओं के नाशक
101)  विघ्नेश्वर (Vighneshwar) - बाधाओं के हरने वाले
102)  विकट  (Vikat) - अत्यंत विशाल
103)  विनायक  (Vinayak) - सब का भगवान
104)  विश्वमुख  (Vshvamukh) - ब्रह्मांड के गुरु
105)  यज्ञकाय  (Yagyakaay) - सभी पवित्र और बलि को स्वीकार करने वाला
106)  यशस्कर  (Yashaskar) - प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी
107)  यशस्विन  (Yashaswin) - सबसे लोकप्रिय देव
108)  योगाधिप (Yogadhip) - ध्यान के प्रभु

वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ।।

Wednesday, August 23, 2017

ॐ गं गणपतये नमः


"वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटी समप्रभ। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।”

अर्थात हे भव्य शरीर, वक्र सूंड, दश लक्ष सूर्यों की चमक वाले गणेशजी, मेरे सारे कर्मों को विघ्नों से हमेशा मुक्त करते रहना।


गणेश जी विघ्नहर्ता हैं। कहा जाता है कि जिस पर गणेश जी की कृपा हो जाए उसके जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं। गणेश जी अपने भक्तों की श्रद्धा और भक्ति देखते हैं। जो भक्त इनके प्रति जितनी श्रद्धा रखता है गणेश जी उस पर उतने ही कृपालु बने रहते हैं। गणेशजी की साधना शीघ्र फलदायी है। गणेश जी जितनी जल्दी अपने भक्तों से गुस्सा होते हैं उतनी ही जल्दी मान भी जाते हैं। शास्त्रों में कुछ आसान उपाय बताए गए हैं जिनसे आप गणेश जी को जल्दी खुश कर सकते हैं।

गणेश जी को खुश करने का सबसे सस्ता और आसान उपाय है दूर्वा से गणेश जी की पूजा करना। उनको प्रिय दूर्वा के चढ़ाने की पूजा शीघ्र फलदायी और सरलतम है। हर दिन सुबह स्नान पूजा करके गणेश जी को पांच दूर्वा यानी हरी घास अर्पित करें। दुर्वा गणेश जी के मस्तक पर रखना चाहिए। चरणों में दुर्वा नहीं रखें।दुर्वा अर्पित करते हुए मंत्र बोलें 'इदं दुर्वादलं ऊं गं गणपतये नमः'। दूर्वा गणेश जी को इसलिए प्रिय है क्योंकि दूर्वा में अमृत मौजूद होता है। गणपति अथर्वशीर्ष में कहा गया गया है कि जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा दुर्वांकुर से करता है वह कुबेर के समान हो जाता है। दुर्वा अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, आर्थिक उन्नति होती है और संतान का सुख मिलता है।

भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए दूसरा सबसे आसान तरीका है मोदक का भोग। पद्म पुराण में गणेश जी को मोदक प्रिय होने की जो कथा मिलती है उसके अनुसार देवताओं ने एक दिव्य मोदक माता पार्वती को दिया। गणेश जी ने मोदक के गुणों का वर्णन माता पार्वती से सुना तो मोदक खाने की इच्छा बढ़ गयी। अपनी चतुराई से गणेश जी ने माता से मोदक प्राप्त कर लिया। गणेश जी को मोदक इतना पसंद आया कि उस दिन से गणेश मोदक प्रिय बन गये। गणपत्यथर्वशीर्ष में लिखा है, "यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वांछितफलमवाप्नोति।" इसका अर्थ है जो व्यक्ति गणेश जी को मोदक अर्पित करके प्रसन्न करता है उसे गणपति मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

सिंदूर की लाली गणेश जी को बहुत पसंद है। गणेश जी की प्रसन्नता के लिए लाल सिंदूर का तिलक लगाएं। गणेश जी को तिलक लगाने के बाद अपने माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं। इससे गणेश जी की कृपा प्राप्त होती है। सिंदूर अर्पण करने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

पंचामृत में एक अमृत घी होता है। घी को पुष्टिवर्धक और रोगनाशक कहा जाता है। भगवान गणेश को घी काफी पसंद है। गणपति अथर्वशीर्ष में घी से गणेश की पूजा का बड़ा महात्म्य बताया गया है। जो व्यक्ति गणेश जी की पूजा घी से करता है उसकी बुद्धि प्रखर होती है।

शमी का पौधा गणेश जी को अत्यंत प्रिय है। शमी के कुछ पत्ते नियमित गणेश जी को अर्पित करें तो घर में धन एवं सुख की वृद्घि होती है। माना जाता है कि भगवान श्री राम ने भी रावण पर विजय पाने के लिए शमी की पूजा की थी।

भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए पवित्र चावल अर्पित करें। पवित्र चावल उसे कहा जाता है जो टूटा हुआ नहीं हो। पूजा में उबले हुए धान से तैयार चावल का प्रयोग नहीं करें। सूखा चावल गणेश जी को नहीं चढ़ाएं। चावल को गीला करें फिर, 'इदं अक्षतम् ऊं गं गणपतये नमः' मंत्र बोलते हुए तीन बार गणेश जी को चावल चढ़ाएं।

गणेश चतुर्थी 2017: पूजा शुभ मुहूर्त और समय

भगवान गणेश को घर लाने का समय:
मध्याह्न के समय को गणेश पूजा: सुबह 11:25 से 1 बजकर 57 मिनट
24 अगस्त को, चंद्रमा को नहीं देखने  का समय- 20: 27 बजे से शाम 21:02 बजे तक
25 अगस्त को, चंद्रमा को नहीं देखने का समय- 09: 00 बजे से 21: 41 बजे तक
अनंत चतुर्दशी दिवस पर गणेश विसर्जन
गणेश विसर्जन के लिए शुभ चोघडिया मुहूर्त
सुबह का मुहूर्त (चार, लाभ, अमृत) - 09:32 बजे- 14:11 अपराह्न
दोपहर का मुहूर्त (शुभ) = 15: 44 बजे- 17:17 बजे
शाम का मुहूर्त(प्रयोग) = 20:17 अपराह्न - 21: 44 बजे
रात का मुहूर्त (शुभ, अमृत, चार) = 23:11 बजे

जय श्री गणेशाय नमः 

Sunday, August 20, 2017

Somvati Amavasya


Somvati  Amavasya in 2017 is on 21st August  and 18th of December . This Amavasya falls only on the day of Monday. It is observed to be auspicious for all the married women. Performing Pitru Puja is considered to be auspicious as it soothes the souls of our ancestors. 

What to do on Somvati Amavasya

On this day i.e. Somvati Amavsaya, you must donate and do Annadann to poor kids. Doing Maun(remaining silent) is considered to be very fruitful on this day.

2. Devotees observing Somvati Vrat must revolves around 108 times around Peepal tree in the morning.

3. They must chant Shani Mantra and worship Lord Vishnu on this day.

3. Taking bath in the holy rivers (Like Ganga and Triveni) on this amavasya is considered to bring prosperity, make them free from diseases, grief and sorrow and help their ancestors to attain salvation.

Somvati Amavasya : Mythology 

once upon a time there lived a money lender who had seven sons and one daughter. He married all his sons but could not find a suitable match for his daughter.

A monk visited their house regularly and blessed the money lender's daughters-in-law but never blessed the daughter. The daughter told her mother about this and she confronted the monk with this question. The monk did reply and left quietly. This really worried the mother and she called a Pandit.

The Pandit told her that her daughter was destined to become a widow. The girl's mother asked the Pandit for a solution to the problem. He told them that there was a washerwoman who lived on the island of Singhal. If that woman agrees to apply vermilion (Sindoor) on the forehead of the girl, her fate will change. The Pandit also told them that observing fast of Somvati Amavasya will also be instrumental in reversing her fate.

The mother sent her daughter and her youngest son to that island. On their way to the island they came across sea shore and wondered how to cross it. Sitting under a tree they saw a vulture's nest. A male and female vulture lived there with their babies. One day when both vultures had gone out of their nest to fetch some food, a snake entered their nest and attacked the babies. All this was being witnessed by the girl who was sitting there. She immediately jumped to help the vulture babies and saved them from the attack.

When the vultures returned they were really pleased to know what had just happened. As a token of their gratitude they helped the girl to reach the washer woman's house. After reaching her destination she started living with the washer woman.

After a few months the woman was really pleased with the girl and applied vermilion (Sindoor) on her forehead. While returning back to her house she also observed Somvati Amavasya. This reversed her fate and then she lived a happy married life with her husband.

Somvati Amavasya : Spiritual Importance 

The darkness of Somvati Amavasya transcends into a beautiful morning which gives us hope that all our sorrows will go away. It also signifies that only after absolute darkness comes a light, which means that absolute despair gives birth to extreme happiness and bliss. Therefore, we should not be afraid of the dark and be ready to face all the troubles that come our way.

Somvati Amavasya : Pitra Dosha

This day is also very auspicious for performing Pitra Tarpan (offering to the ancestors) as it provides peace to their souls. People suffering from Pitra Dosh should also observe this fast as it frees them from it.  You can also offer milk rice ( Kheer ) facing South to fire  It is believed that we can bring peace to our ancestors’ souls by taking a holy dip in the sacred river Ganga on this day. The holy dip washes away all our sorrows and helps us progress and prosper.


Friday, August 18, 2017

॥ एकाक्षरगणपतिकवचम् ॥

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

  
नमस्तस्मै गणेशाय सर्वविघ्नविनाशिने । 
कार्यारम्भेषु सर्वेषु पूजितो यः सुरैरपि ॥ १॥ 

पार्वत्युवाच । 
भगवन् देवदेवेश लोकानुग्रहकारकः ।
 इदानी श्रोतृमिच्छामि कवचं यत्प्रकाशितम् ॥ २॥ 

एकाक्षरस्य मन्त्रस्य त्वया प्रीतेन चेतसा ।
 वदैतद्विधिवद्देव यदि ते वल्लभास्म्यहम् ॥ ३॥ 

ईश्वर उवाच ।
 श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाख्येयमपि ते ध्रुवम् । 
एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं सर्वकामदम् ॥ ४॥ 

यस्य स्मरणमात्रेण न विघ्नाः प्रभवन्ति हि । 
त्रिकालमेककालं वा ये पठन्ति सदा नराः ॥ ५॥

 तेषां क्वापि भयं नास्ति सङ्ग्रामे सङ्कटे गिरौ ।
 भूतवेतालरक्षोभिर्ग्रहैश्चापि न बाध्यते ॥ ६॥

 इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् गणनायकम् । 
न च सिद्धिमाप्नोति मूढो वर्षशतैरपि ॥ ७॥

 अघोरो मे यथा मन्त्रो मन्त्राणामुत्तमोत्तमः ।
 तथेदं कवचं देवि दुर्लभं भुवि मानवैः ॥ ८॥

 गोपनीयं प्रयत्नेन नाज्येयं यस्य कस्यचित् । 
तव प्रीत्या महेशानि कवचं कथ्यतेऽद्भुतम् ॥ ९॥ 

एकाक्षरस्य मन्त्रस्य गणकश्चर्षिरीरितः ।
 त्रिष्टुप् छन्दस्तु विघ्नेशो देवता परिकीर्तिता ॥ १०॥ 

गँ बीजं शक्तिरोङ्कारः सर्वकामार्थसिद्धये ।
 सर्वविघ्नविनाशाय विनियोगस्तु कीर्तितः ॥ ११॥

 ध्यानम् । 
रक्ताम्भोजस्वरूपं लसदरुणसरोजाधिरूढं त्रिनेत्रं पाशं 
चैवाङ्कुशं वा वरदमभयदं बाहुभिर्धारयन्तम् ।
 शक्त्या युक्तं गजास्यं पृथुतरजठरं नागयज्ञोपवीतं देवं 
चन्द्रार्धचूडं सकलभयहरं विघ्नराजं नमामि ॥ १२॥

 कवचम् ।
 गणेशो मे शिरः पातु भालं पातु गजाननः ।
 नेत्रे गणपतिः पातु गजकर्णः श्रुती मम ॥ १३॥ 

कपोलौ गणनाथस्तु घ्राणं गन्धर्वपूजितः ।
 मुखं मे सुमुखः पातु चिबुकं गिरिजासुतः ॥ १४॥ 

जिह्वां पातु गणक्रीडो दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ।
 वाचं विनायकः पातु कष्टं पातु महोत्कटः ॥ १५॥

 स्कन्धौ पातु गजस्कन्धो बाहू मे विघ्ननाशनः ।
 हस्तौ रक्षतु हेरम्बो वक्षः पातु महाबलः ॥ १६॥ 

हृदयं मे गणपतिरुदरं मे महोदरः । 
नाभि गम्भीरहृदयः पृष्ठं पातु सुरप्रियः ॥ १७॥

 कटिं मे विकटः पातु गुह्यं मे गुहपूजितः । 
ऊरु मे पातु कौमारं जानुनी च गणाधिपः ॥ १८॥ 

जङ्घे गजप्रदः पातु गुल्फौ मे धूर्जटिप्रियः ।
 चरणौ दुर्जयः पातुर्साङ्गं गणनायकः ॥ १९॥ 

आमोदो मेऽग्रतः पातु प्रमोदः पातु पृष्ठतः । 
दक्षिणे पातु सिद्धिशो वामे विघ्नधरार्चितः ॥ २०॥

 प्राच्यां रक्षतु मां नित्यं चिन्तामणिविनायकः । 
आग्नेयां वक्रतुण्डो मे दक्षिणस्यामुमासुतः ॥ २१॥

 नैऋत्यां सर्वविघ्नेशः पातु नित्यं गणेश्वरः ।
 प्रतीच्यां सिद्धिदः पातु वायव्यां गजकर्णकः ॥ २२॥ 

कौबेर्यां सर्वसिद्धिशः ईशान्यामीशनन्दनः । 
ऊर्ध्वं विनायकः पातु अधो मूषकवाहनः ॥ २३॥ 

दिवा गोक्षीरधवलः पातु नित्यं गजाननः ।
 रात्रौ पातु गणक्रीडः सन्ध्योः सुरवन्दितः ॥ २४॥

 पाशाङ्कुशाभयकरः सर्वतः पातु मां सदा । 
ग्रहभूतपिशाचेभ्यः पातु नित्यं गजाननः ॥ २५॥ 

सत्वं रजस्तमो वाचं बुद्धिं ज्ञानं स्मृतिं दयाम् ।
 धर्मचतुर्विधं लक्ष्मीं लज्जां कीर्तिं कुलं वपुः ॥ २६॥ 

धनं धान्यं गृहं दारान् पौत्रान् सखींस्तथा ।
 एकदन्तोऽवतु श्रीमान् सर्वतः शङ्करात्मजः ॥ २७॥

 सिद्धिदं कीर्तिदं देवि प्रपठेन्नियतः शुचिः । 
एककालं द्विकालं वापि भक्तिमान् ॥ २८॥

 न तस्य दुर्लभं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
 सर्वपापविनिर्मुक्तो जायते भुवि मानवः ॥ २९॥

 यं यं कामयते नित्यं सुदुर्लभमनोरथम् ।
 तं तं प्राप्नोति सकलं षण्मासान्नात्र संशयः ॥ ३०॥ 

मोहनस्तम्भनाकर्षमारणोच्चाटनं वशम् ।
 स्मरणादेव जायन्ते नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥ 

सर्वविघ्नहरं देवं ग्रहपीडानिवारणम् ।
 सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वापत्तिनिवारणम् ॥ ३२॥

 धृत्वेदं कवचं देवि यो जपेन्मन्त्रमुत्तमम् ।
 न वाच्यते स विघ्नौघैः कदाचिदपि कुत्रचित् ॥ ३३॥

 भूर्जे लिखित्वा विधिवद्धारयेद्यो नरः शुचिः । 
एकबाहो शिरः कण्ठे पूजयित्वा गणाधिपम् ॥ ३४॥

 एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं देवि दुर्लभम् ।
 यो धारयेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते ॥ ३५॥ 

गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ।
 पठेद्वा पाठयेद्वापि तस्य सिद्धिः करे स्थिता ॥ ३६॥

 न प्रकाश्यं महेशानि कवचं यत्र कुत्रचित् । 
दातव्यं भक्तियुक्ताय गुरुदेवपराय च ॥ ३७॥ 

॥ इति श्रीरुद्रयामले एकाक्षरगणपतिकवचं सम्पूर्णम् ॥

महाकाली महाविजय यन्त्र / कवच धारण से लाभ

१.  महाकाली की कृपा से व्यक्ति की सार्वभौम उन्नति होती है | स्थायी सम्पत्ति में विशेष वृद्धि होती है और     स्थावर सम्पत्ति विषयक...